नजरबंदी के आदेश के खिलाफ प्रतिवेदन पर जल्दी विचार के लिए अधिकारी कर्तव्यबद्ध: न्यायालय

नजरबंदी के आदेश के खिलाफ प्रतिवेदन पर जल्दी विचार के लिए अधिकारी कर्तव्यबद्ध: न्यायालय

नजरबंदी के आदेश के खिलाफ प्रतिवेदन पर जल्दी विचार के लिए अधिकारी कर्तव्यबद्ध: न्यायालय
Modified Date: November 29, 2022 / 08:50 pm IST
Published Date: January 5, 2022 6:18 pm IST

नयी दिल्ली, पांच जनवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि सक्षम प्राधिकार का कर्तव्य है कि वह नजरबंदी के आदेश के खिलाफ प्रतिवेदन पर जल्दी विचार करे और अन्य आधिकारिक कार्यों में व्यस्त रहने के स्पष्टीकरण को कानून के तहत स्वीकार्य नहीं किया जा सकता है।

उच्चतम न्यायालय तमिलनाडु में एक व्यक्ति के खिलाफ जिलाधिकारी द्वारा पिछले साल जुलाई में जारी एहतियाती हिरासत के आदेश से संबंधित एक याचिका की सुनवाई कर रहा था। न्यायालय ने कहा कि आदेश के खिलाफ 30 जुलाई, 2021 के प्रतिवेदन पर विचार करने में संबंधित प्राधिकर ने करीब दो महीने का समय लिया।

न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और न्यायमूर्ति सी टी रविकुमार की पीठ ने कहा, ‘यह कोई बहाना नहीं है।’ इससे पहले राज्य की ओर से पेश वकील ने पीठ से कहा कि कोविड​​​​-19 की स्थिति के कारण मंत्री को इस मामले से निपटने में देरी हुई।

इस पर पीठ ने मौखिक रूप से कहा, ‘मंत्री पहले से व्यस्त थे, यह कोई बचाव नहीं है… वह एक दिन के लिए व्यस्त हो सकते हैं। वह एक सप्ताह के लिए व्यस्त हो सकते हैं। महीनों तक नहीं।’’

पीठ ने कहा कि भले ही यह मामला प्रतिवेदन पर विचार करने में सक्षम प्राधिकारी की सुस्ती का नहीं हो, लेकिन ऐसा करने में लगे समय को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

पीठ ने कहा कि गिरफ्तार किए गए व्यक्ति की एहतियाती हिरासत से संबंधित प्रतिवेदन पर गौर करने के लिए करीब दो महीने के समय की आवश्यकता नहीं है। इसके साथ ही पीठ ने कहा कि उसके खिलाफ लंबित किसी भी आपराधिक मामले में आवश्यक नहीं होने पर उसे तुरंत रिहा किया जाए।

शीर्ष अदालत ने यह आदेश गिरफ्तार किए गए व्यक्ति की पत्नी की एक याचिका पर दिया, जिसने पिछले साल नवंबर में मद्रास उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती दी थी।

भाषा अविनाश अनूप

अनूप


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