संसदीय समिति ने भारत-श्रीलंका संबंधों, वैश्विक प्रौद्योगिकी कूटनीति पर चर्चा की

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संसदीय समिति ने भारत-श्रीलंका संबंधों, वैश्विक प्रौद्योगिकी कूटनीति पर चर्चा की

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  • Publish Date - April 30, 2026 / 05:51 PM IST,
    Updated On - April 30, 2026 / 05:51 PM IST

नयी दिल्ली, 30 अप्रैल (भाषा) संसद की एक समिति ने भारत-श्रीलंका संबंधों और वैश्विक प्रौद्योगिकी कूटनीति में नयी दिल्ली की भूमिका पर बृहस्पतिवार को चर्चा की, जिसमें ‘‘बहुत ही रचनात्मक और सकारात्मक’’ विचार-विमर्श हुआ।

संसद की विदेश मामलों की स्थायी समिति के अध्यक्ष शशि थरूर ने कहा कि समिति की लगातार हुई बैठकों में गहन चर्चा हुई और सदस्यों से बहुत अच्छे विचार और प्रतिक्रिया मिली।

थरूर ने यहां संवाददाताओं से कहा, ‘‘मैं कहना चाहूंगा कि आपको दोनों विषयों पर जल्द ही अच्छी रिपोर्ट मिलेगी। प्रौद्योगिकी कूटनीति के संबंध में, समिति जिस रचनात्मक और सकारात्मक तरीके से काम कर रही है, उससे मैं बहुत प्रसन्न हूं।’’

प्रौद्योगिकी कूटनीति अंतरराष्ट्रीय संबंधों का एक उभरता हुआ क्षेत्र है जो राष्ट्रों, प्रौद्योगिकी कंपनियों और नागरिक संस्थाओं के बीच सहयोग के माध्यम से वैश्विक डिजिटल नीति, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), सेमीकंडक्टर और साइबर सुरक्षा के प्रबंधन पर केंद्रित है।

यह पूछे जाने पर कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के समय नयी दिल्ली आर्थिक और अन्य मुद्दों पर कोलंबो के साथ किस प्रकार सहयोग कर रही है, तो उन्होंने कहा कि श्रीलंका को भी अमेरिका-ईरान युद्ध के परिणामों का खामियाजा भुगतना पड़ा है, जिसने उसकी ऊर्जा सुरक्षा और मुद्रास्फीति को प्रभावित किया है।

पूर्व विदेश राज्य मंत्री ने कहा, ‘‘स्पष्ट रूप से, श्रीलंका के साथ भारत की एकजुटता में इस पहलू को भी ध्यान में रखना होगा। पिछले एक दशक से हम श्रीलंका के साथ अपने सहयोग के विभिन्न पहलुओं पर विचार कर रहे हैं। और मुझे विश्वास है कि इस विनाशकारी संघर्ष के परिणामों से निपटने में भारत आवश्यकतानुसार साथ देगा।’’

पश्चिम एशिया की स्थिति पर उन्होंने कहा कि वहां एक बेहद असामान्य परिदृश्य बना हुआ है, क्योंकि न तो शांति है, न युद्ध, न कोई विजेता है, न कोई हारने वाला।

लोकसभा सदस्य थरूर ने कहा, ‘‘हर कोई इससे निकलने का रास्ता खोजने के लिए बातचीत में लगा हुआ है। मुझे लगता है कि यह एक चुनौती रही है क्योंकि नुकसान उठाने वालों में वे भी शामिल हैं जो इस युद्ध का हिस्सा नहीं हैं।’’

कांग्रेस नेता ने कहा, ‘‘युद्ध क्षेत्र से बाहर के देश, जैसे हम और हमारे पड़ोसी देश, ‘ग्लोबल साउथ’ के देश, जिनकी अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा और आपूर्ति श्रृंखलाएं बुरी तरह प्रभावित हुई हैं।’’

उन्होंने कहा, ‘‘पीड़ित वे (देश) नहीं हैं जो युद्ध लड़ रहे हैं।’’

‘ग्लोबल साउथ’ से तात्पर्य मुख्य रूप से एशिया, अफ्रीका, लातिन अमेरिका स्थित विकासशील, कम विकसित या अविकसित देशों से है।

भाषा सुभाष मनीषा

मनीषा