नयी दिल्ली, 27 मार्च (भाषा) संसद की एक समिति ने विभिन्न पुराने जिला कलेक्टरेट भवनों को ‘ध्वस्त’ किए जाने की ओर ध्यान दिलाते हुए भारतीय पुरातत्व संरक्षण (एएसआई) के दायरे में नहीं आने वाली ब्रिटिशकालीन धरोहर स्थलों के संरक्षण का सुझाव दिया है।
साथ ही समिति ने ‘जोखिम में आ चुकी गैर-एएसआई विरासत संरचनाओं’ की, राज्य सरकारों के साथ तालमेल कर एक सूची तैयार करने की भी सिफारिश की है।
परिवहन, पर्यटन और संस्कृति संबंधित संसद की स्थायी समिति ने संस्कृति मंत्रालय को ‘रेल इंजन, जहाज और विमान’ जैसी विरासत संपत्तियों के संरक्षण के लिए रेलवे, शिपिंग, रक्षा और नागरिक उड्डयन मंत्रालयों के साथ समन्वय करने का सुझाव दिया।
संसद के दोनों सदनों में 25 मार्च को पेश समिति की ‘संस्कृति मंत्रालय की अनुदान मांगें (2026-27)’ संबंधी रिपोर्ट में कहा गया है कि एएसआई 38 सर्किलों के माध्यम से 3,685 केंद्रीय संरक्षित स्मारकों का रखरखाव करता है।
भारत में कई ऐतिहासिक संपत्तियां और स्थल हैं, जिनमें प्राचीन मंदिरों और अन्य स्मारकों से लेकर मध्ययुगीन संरचनाएं और औपनिवेशिक युग की इमारतें शामिल हैं। इनमें ब्रिटिश शासन या डच युग के दौरान या फ्रांसीसी, डेनिश और पुर्तगाली औपनिवेशिक शासकों द्वारा निर्मित इमारतें भी शामिल हैं।
एएसआई-संरक्षित स्थलों में बड़े पैमाने पर प्राचीन युग या मध्ययुगीन काल के स्मारक और पुरातात्विक अवशेष शामिल हैं। विभिन्न राज्यों के पास अपने पुरातत्व विभाग भी हैं जो एएसआई के तहत संरक्षित नहीं किए गए कई पुराने स्थलों की देखभाल करते हैं।
बड़ी संख्या में औपनिवेशिक युग की इमारतें, जो मुख्य रूप से ब्रिटिश काल के दौरान निर्मित और प्रतिष्ठित वास्तुकला से संपन्न थीं, का उपयोग जिला कलेक्टरेट, जिला बोर्ड और नगरपालिका कार्यालयों जैसे सरकारी कार्यालयों के अलावा संग्रहालयों, पुस्तकालयों और रेलवे स्टेशनों तथा अन्य उद्देश्यों के लिए किया जाता है।
हालाँकि, इनमें से कई पुरानी इमारतें, अपने ऐतिहासिक मूल्य और स्थापत्य चरित्र के बावजूद, किसी भी प्राधिकरण के तहत संरक्षित नहीं हैं तथा विशेषज्ञ उनक क्षय या क्षतिग्रस्त होने की आशंका है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘समिति ने संरक्षण की आवश्यकता वाले ब्रिटिश-युग के विरासत स्थलों का मुद्दा उठाया’ था। समिति ने इसके लिए जो विशिष्ट उदाहरण दिये उनमें 74 जिला कलेक्ट्रेट भवनों को ध्वस्त किया जाना, दरभंगा में डीजी पोस्ट भवन (150 वर्ष पुराना); और पटना क्लॉक टॉवर शामिल हैं।
डच काल और ब्रिटिश काल की प्रतिष्ठित संरचनाओं की विशेषता वाले पटना कलेक्ट्रेट परिसर को अप्रैल 2022 में विभिन्न विरासत प्रेमियों के विरोध और विशेषज्ञों द्वारा असुरक्षित ऐतिहासिक स्थल को संरक्षित करने की अपील के बीच ढहा दिया गया था।
पिछले कुछ दशकों में अन्य राज्यों में औपनिवेशिक काल की कई अन्य असुरक्षित इमारतों को भी ध्वस्त कर दिया गया है।
स्थायी समिति ने गोवा और देशभर में गिरजाघरों और चैपलों के संरक्षण की आवश्यकता पर भी गौर किया।
रिपोर्ट में बिहार में सासाराम किला (शेर शाह सूरी से जुड़ा) सहित मानव रहित किलों के बारे में भी चिंता जतायी गयी है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि समिति ने सिफारिश की है कि संस्कृति मंत्रालय ‘राज्य सरकारों के साथ तालमेल कर जोखिम में आईं गैर-एएसआई विरासत संरचनाओं की एक सूची तैयार करे’ और प्रस्तावित नई बुनियादी ढांचा योजना के तहत वास्तुशिल्प विरासत घटक की सुरक्षा भी सुनिश्चित करें। उसने कहा कि यह काम विशेष रूप से 100-200 साल पुराने मुख्य ढांचों और संरचनाओं को ध्यान रखते हुए किया जाना चाहिए।
समिति ने कहा कि मंत्रालय को राज्य-स्तरीय पुरातात्विक स्थलों पर ‘संरक्षण हस्तक्षेप के लिए मानक संचालन प्रक्रिया’ विकसित और जारी करनी चाहिए।
रिपोर्ट में कहा गया है कि अभिलेखागार और विरासत संरक्षण पर केंद्र-राज्य समन्वय के लिए एक औपचारिक तंत्र स्थापित किया जाना चाहिए, और क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों के कामकाज और समन्वय की समीक्षा की जानी चाहिए, जिसके निष्कर्ष 90 दिनों के भीतर समिति को प्रस्तुत किए जाएंगे।
जद (यू) सांसद संजय कुमार झा की अध्यक्षता में स्थायी समिति ने बिहार में प्राचीन पाटलिपुत्र के स्थल – पटना के कुम्हरार में ‘रखरखाव की कमी’ के बारे में भी विशेष चिंताएं उठाईं।
‘बोधगया मंदिर प्रबंधन समिति पुनर्स्थापना परियोजना’ को लेकर समिति ने इस तथ्य की ओर ध्यान दिलाया कि कि 2014 में एक पुनर्स्थापना परियोजना के लिए 1.68 करोड़ रुपये जमा किए गए थे, लेकिन काम शुरू नहीं किया गया है, और सामग्री अप्रयुक्त पड़ी हुई है।
समिति ने यह भी कहा कि बिहार में ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण वैशाली स्थल पर ‘सीमित उत्खनन कार्य’ देखा गया है।
इसने आगे कहा कि हैदराबाद में चारमीनार के पीछे का क्षेत्र ‘मूत्रालय के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है’।
भाष्ज्ञा
माधव मनीषा
मनीषा