‘द केरल स्टोरी 2’ के खिलाफ दायर याचिकाएं सुनवाई योग्य नहीं: फिल्म निर्माता ने उच्च न्यायालय से कहा

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'द केरल स्टोरी 2' के खिलाफ दायर याचिकाएं सुनवाई योग्य नहीं: फिल्म निर्माता ने उच्च न्यायालय से कहा

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  • Publish Date - February 25, 2026 / 09:44 PM IST,
    Updated On - February 25, 2026 / 09:44 PM IST

कोच्चि, 25 फरवरी (भाषा) ‘द केरल स्टोरी 2 – गोज बियॉन्ड’ के निर्माता ने केरल उच्च न्यायालय से कहा है कि फिल्म की रिलीज का विरोध करने संबंधी याचिकाएं ‘‘समय से पहले दायर की गईं, गलत धारणा पर आधारित हैं और विचारणीय नहीं हैं।’’

फिल्म के निर्माता विपुल अमृतलाल शाह ने मंगलवार को उच्च न्यायालय में दायर एक हलफनामे में यह बात कही।

याचिकाओं का विरोध करते हुए, केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) ने बुधवार को कहा कि याचिकाकर्ताओं के पास पुनर्विचार याचिका दायर करने का वैकल्पिक वैधानिक उपाय उपलब्ध है।

इसने अदालत से यह भी कहा कि याचिकाएं जनहित याचिकाओं के रूप में दायर की जानी चाहिए थीं, जिनकी सुनवाई एक खंडपीठ द्वारा की जाती है।

याचिकाकर्ताओं ने दलील दी है कि फिल्म का उद्देश्य केरल की छवि को धूमिल करना और वहां के लोगों की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाना है।

उन्होंने आरोप लगाया कि फिल्म के ‘टीजर’ और ‘ट्रेलर’ भ्रामक थे और सोशल मीडिया पर दिखाई गई सामग्री ऐसी थी जिसे सिनेमाघरों में नहीं दिखाया जा सकता था।

याचिकाकर्ताओं में से एक, श्रीदेव नंबूदरी की ओर से पेश वकील मैत्रेयी सच्चिदानंद हेगड़े ने अदालत को बताया, ‘‘वे (निर्माता) टीजर और ट्रेलर के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से वह कर रहे हैं जो वे प्रत्यक्ष रूप से नहीं कर सकते।’’

डेढ़ घंटे से अधिक समय तक दलीलें सुनने के बाद, न्यायमूर्ति बी. कुरियन थॉमस ने कहा कि इस मामले पर बृहस्पतिवार को आगे सुनवाई होगी।

न्यायमूर्ति थॉमस ने कहा कि इस मामले की सुनवाई बृहस्पतिवार को सुबह नौ बजकर 45 मिनट पर फिर से होगी।

सुनवाई के दौरान, अदालत ने कहा कि वह ‘टीजर’ और ‘ट्रेलर’ के संबंध में कोई आदेश पारित नहीं कर सकती, क्योंकि इस संबंध में कोई विशिष्ट राहत नहीं मांगी गई है।

अदालत ने यह पाया कि फिल्म का शीर्षक आपत्तिजनक नहीं है, जब तक कि इसे ‘टीजर’ और ‘ट्रेलर’ में दिखाई गई सामग्री से न जोड़ा जाए।

शाह ने अपने हलफनामे में दावा किया है कि सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 के तहत गठित सेंसर बोर्ड ‘सीबीएफसी’ ही एकमात्र विशेषज्ञ प्राधिकरण है, जिसे फिल्मों की संपूर्ण पड़ताल करने और सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए प्रमाणित करने का अधिकार है।

उन्होंने अपने हलफनामे में कहा है, ‘‘इस न्यायालय का पर्यवेक्षी क्षेत्राधिकार किसी फिल्म की विषयवस्तु के संबंध में प्रमाणन प्राधिकारी के निर्णय के स्थान पर अपना स्वयं का मूल्यांकन थोपने तक विस्तारित नहीं है।’’

उन्होंने फिल्म के खिलाफ दायर याचिकाओं में लगे आरोपों का भी खंडन किया है और इन्हें ‘‘कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग’’ बताया है।

निर्माता ने कहा है कि याचिका दायर होने से 16 दिन पहले ‘टीजर’ जारी किया गया था।

उन्होंने कहा है कि केवल दो मिनट के ‘टीजर’ के आधार पर और पूरी फिल्म की जांच-पड़ताल किये बिना किसी प्रमाणित फिल्म के प्रदर्शन पर रोक नहीं लगाई जा सकती।

उन्होंने कहा कि पूरी फिल्म की जांच-पड़ताल किये बिना, सीबीएफसी के फैसले में किसी भी कानूनी खामी का प्रथमदृष्टया पता लगाये बिना और केवल एक ‘टीजर’ के आधार पर प्रतिबंध लगाना ‘‘प्रतिवादी (निर्माता), हजारों प्रदर्शकों और देशभर के वितरण भागीदारों को जबरदस्त आर्थिक नुकसान पहुंचाएगा’’।

विपुल अमृतलाल शाह ने दावा किया, ‘‘यह फिल्म भारत के साथ-साथ विदेशों में भी 1,800 से अधिक सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली है।’’

फिल्म के शीर्षक के बारे में उन्होंने कहा है कि फिल्म के नाम में जो ‘गोज बियॉन्ड’ शब्द जोड़ा गया है, वह सिर्फ शीर्षक को ‘‘आकर्षक बनाने के लिए नहीं’’ है, बल्कि इसका वास्तविक महत्व और उद्देश्य है।

हफलनामे में दावा किया गया है कि ऐसा जानबूझकर किया गया है, जिसे ‘टीजर’ में कई बिंदुओं पर प्रमुख रूप से प्रस्तुत किया गया है, जो दर्शाता है कि फिल्म की कथा केवल केरल तक सीमित नहीं है।

उन्होंने यह भी कहा कि यदि भीड़ की हिंसा या विरोध प्रदर्शन से सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका हो, तो इसे रोकने के लिए कदम उठाना सरकार का कर्तव्य है और इसके परिणामस्वरूप किसी फिल्म की रिलीज को रोका नहीं जा सकता।

हलफनामे में कहा गया है, ‘‘ऐसी स्थिति जिसमें कोई भी व्यक्ति या समूह केवल अव्यवस्था की धमकी देकर किसी प्रमाणित फिल्म के प्रदर्शन पर प्रभावी रूप से रोक लगा सकता है, तो सीबीएफसी प्रमाणन प्रक्रिया और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की संवैधानिक गारंटी दोनों ही का कोई मतलब नहीं रह जायेगा।’’

अदालत ने मंगलवार को मौखिक रूप से टिप्पणी की थी कि फिल्म के ‘टीजर’ और ‘ट्रेलर’ में केरल जैसे राज्य को गलत तरीके से दर्शाया गया है, जबकि यह ऐसा राज्य है जहां हर कोई सांप्रदायिक सद्भाव के साथ रहता है।

अदालत ने यह भी कहा था कि राज्य के नाम का इस्तेमाल करना और यह दावा करना कि फिल्म सच्चे तथ्यों पर आधारित है, राज्य में सांप्रदायिक तनाव पैदा कर सकता है।

‘द केरल स्टोरी 2 – गोज़ बियॉन्ड’ को सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए दिए गए प्रमाणपत्र को रद्द करने के अनुरोध के मकसद से तीन अलग-अलग याचिकाएं दायर की गईं हैं। फिल्म 27 फरवरी को रिलीज होनी है।

इन तीन में से एक याचिका कन्नूर जिले के कन्नवम निवासी श्रीदेव नंबूदरी ने दायर की है। उन्होंने पिछले सप्ताह दायर अपनी रिट याचिका में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) और निर्माता विपुल अमृतलाल शाह को प्रतिवादी बनाया है।

याचिकाकर्ता ने दावा किया है कि फिल्म को कथित तौर पर सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 के तहत वैधानिक आदेश का उचित अनुपालन किए बिना सीबीएफसी द्वारा सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए प्रमाणपत्र दिया गया।

याचिका के अनुसार, यह शिकायत फिल्म के ‘टीज़र’ और ‘ट्रेलर’ से उत्पन्न हुई है, जिसमें कई राज्यों की महिलाओं से जुड़ी कहानियों को दर्शाया गया है, फिर भी सामग्री को ‘द केरल स्टोरी’ के रूप में प्रचारित किया गया है, जिससे आतंकवाद, जबरन धर्मांतरण और जनसांख्यिकीय षड्यंत्र की कथित घटनाएं विशेष रूप से केरल राज्य की लगती हैं।

याचिका में कहा गया है, ‘‘इस तरह के चित्रण में पूरे क्षेत्र की आबादी को कलंकित करने, सार्वजनिक व्यवस्था को बिगाड़ने और सांप्रदायिक व क्षेत्रीय वैमनस्य भड़काने की क्षमता है।’’

भाषा

देवेंद्र अविनाश

अविनाश