नयी दिल्ली, 21 सितंबर (भाषा) गैर-लाभकारी संगठन पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया (पीएफआई) ने भारत में बदलती जनसांख्यिकीय स्थिति के बीच जनसंख्या नियंत्रण से आगे बढ़ते हुए समानता व जनसांख्यिकीय तैयारियों पर ध्यान केंद्रित करने की अपील की है।
पीएफआई ने प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (ईएसी-पीएम) की हालिया रिपोर्ट ‘द घोस्ट ऑफ पॉपुलेशन पास्ट: हाउ पॉपुलेशन कंट्रोल पर्सिस्ट्स इन इंडिया’ के बाद भारत की बदलती जनसांख्यिकीय स्थिति पर फिर से ध्यान दिए जाने का स्वागत किया।
गैर-लाभकारी संगठन ने कहा कि इस रिपोर्ट में महत्वपूर्ण बात कही गई है कि भारत को जनसंख्या नियंत्रण की पुरानी भाषा और नीतिगत सोच से आगे बढ़ना चाहिए। संगठन ने कहा कि देश की कुल प्रजनन दर अब प्रतिस्थापन स्तर से नीचे आ गई है।
इसने कहा, “भारत में प्रजनन दर पहले ही काफी कम हो चुकी है और देश की कुल प्रजनन दर अब प्रतिस्थापन स्तर से नीचे है।”
संगठन ने कहा कि कई राज्य, खासकर दक्षिणी, पश्चिमी और उत्तरी भारत के कुछ हिस्से, पहले ही बहुत कम प्रजनन दर का सामना कर रहे हैं। ऐसे राज्यों को बढ़ती बुजुर्ग आबादी, युवाओं की घटती संख्या, देखभाल की जरूरतों, पलायन और कार्यबल में होने वाले बदलावों के लिए पहले से योजना बनानी होगी।
पीएफआई की कार्यकारी निदेशक पूनम मुत्तरेजा ने कहा, “ भारत में जनसांख्यिकीय बदलाव अब भी काफी असमान है।”
उन्होंने कहा, “राष्ट्रीय औसत राज्यों, जिलों, आय वर्गों, ग्रामीण और शहरी आबादी तथा शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच के स्तर के बीच मौजूद महत्वपूर्ण अंतर को छिपा देते हैं।”
उन्होंने कहा, “बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य तथा पूर्वी भारत के कुछ हिस्सों में अब भी युवा आबादी अधिक है और इनकी विकास संबंधी जरूरतें केरल, तमिलनाडु, पंजाब, पश्चिम बंगाल, दिल्ली और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों से अलग हैं।”
संगठन ने कहा कि परिवार नियोजन भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य एजेंडे का महत्वपूर्ण हिस्सा बना रहना चाहिए, लेकिन इसे जनसंख्या कम करने के साधन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
संगठन ने कहा कि परिवार नियोजन को प्रजनन संबंधी स्वायत्तता, बच्चों के जन्म के बीच अंतर रखने, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य और गुणवत्तापूर्ण सेवाओं तक पहुंच के मुद्दे के रूप में समझा जाना चाहिए।
संगठन ने कहा कि प्रजनन दर में गिरावट के बावजूद, भारत के कई हिस्सों में गर्भनिरोधक साधनों की जरूरत पूरी न होना, कम उम्र में विवाह, किशोरों के स्वास्थ्य से जुड़ी चिंताएं, बेटे को प्राथमिकता देना, उचित परामर्श की कमी आदि अब भी महत्वपूर्ण चुनौतियां हैं।
पीएफआई ने कहा कि भारत में आधुनिक गर्भनिरोधक साधनों के इस्तेमाल की दर बढ़कर 56.5 प्रतिशत हो गई है, लेकिन गर्भनिरोधक साधनों में अब भी स्थायी तरीकों का इस्तेमाल सबसे अधिक है।
संगठन ने कहा कि आधुनिक गर्भनिरोधक साधनों के इस्तेमाल में अकेले महिला नसबंदी की हिस्सेदारी करीब दो-तिहाई है, जबकि पुरुष नसबंदी की हिस्सेदारी नगण्य है और यह एक प्रतिशत से भी कम है।
भाषा तान्या अविनाश
अविनाश