दुष्कर्म के मामले में पहले से शील भंग होने से आरोपी को संदेह का लाभ नहीं मिल सकता:अदालत

दुष्कर्म के मामले में पहले से शील भंग होने से आरोपी को संदेह का लाभ नहीं मिल सकता:अदालत

दुष्कर्म के मामले में पहले से शील भंग होने से आरोपी को संदेह का लाभ नहीं मिल सकता:अदालत
Modified Date: June 28, 2026 / 12:02 am IST
Published Date: June 28, 2026 12:02 am IST

प्रयागराज, 27 जून (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने दुष्कर्म के एक मामले में कहा है कि यदि पीड़िता का बयान विश्वसनीय है तो पहले से शील भंग (हाइमन फटे होने) होने पर आरोपी को संदेह का लाभ नहीं मिल सकता।

इस टिप्पणी के साथ उच्च न्यायालय ने 1982 की घटना के संबंध में दुष्कर्म के आरोपी को मिली तीन साल की सजा को सही ठहराया।

न्यायमूर्ति संतोष राय की पीठ ने स्पष्ट किया कि ‘हाइमन’ कई वजहों से फट सकता है जैसे खेलकूद, साइकिल की सवारी, जिमनास्टिक, घुड़सवारी, ज्यादा शारीरिक मेहनत या अचानक लगी चोट आदि से।

उच्च न्यायालय ने कहा कि कुछ लड़कियों में जन्म से ही ‘हाइमन’ में छेद होता है या ‘हाइमन’ नहीं होता, जबकि कुछ में यह अत्यधिक लचीला होता है, इसलिए, इस तरह की मेडिकल रिपोर्ट, पीड़िता के विश्वसनीय बयान से अधिक महत्वपूर्ण नहीं हो सकती।

इस मामले में आरोपी राकेश ने अपनी दोषसिद्धि और तीन साल की सजा को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय का रुख किया था। यह सजा, इलाहाबाद के अपर सत्र न्यायाधीश द्वारा मई, 1983 में सुनाई गई थी।

इस मामले के तथ्यों के मुताबिक, 15 वर्षीय एक नाबालिग लड़की सुबह साढ़े नौ बजे शौच के लिए खेत में गई थी। आरोपी राकेश और उसके साथियों ने उसे बीच में रोका एवं बारी-बारी से उसके साथ दुष्कर्म किया और विरोध करने पर उसे मारा-पीटा।

इस मामले में निचली अदालत ने पीड़िता के मौखिक बयान के आधार पर आरोपी को दोषी करार दिया था। मेडिकल रिपोर्ट से पता चला कि पीड़िता के शरीर पर छह अलग अलग चोटें थीं जिनमें खरोचें और अंदरूनी चोटें शामिल थीं।

उच्च न्यायालय के समक्ष आपराधिक अपील पर सुनवाई के दौरान, आरोपी के वकील ने दलील दी कि मेडिकल साक्ष्य से पीड़िता का पहले से ही शीलभंग होने का संकेत मिला जिससे प्रतीत होता है कि उसने आदतन अन्य लोगों से शारीरिक संबंध बनाए थे।

उन्होंने कहा कि उनके मुवक्किल ने कोई दुष्कर्म नहीं किया।

हालांकि उच्च न्यायालय ने यह दलील खारिज करते हुए कहा कि यदि शील पहले से ही भंग हो तो भी आरोपी को संदेह का लाभ नहीं दिया जा सकता, जबकि दुष्कर्म के संबंध में पीड़िता का बयान पूरी तरह से विश्वसनीय है।

उच्च न्यायालय ने कहा कि आमतौर पर दुष्कर्म का अपराध एक सुनसान जगह पर किया जाता है जिससे स्वतंत्र चश्मदीद गवाह ढूंढने की व्यवहारिक रूप से संभावना नहीं बनती।

आरोपी राकेश वर्तमान में जमानत पर है। उच्च न्यायालय ने 23 जून को दिए अपने निर्णय में आरोपी की जमानत रद्द कर दी और उसे 10 दिनों के भीतर निचली अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण करने और शेष सजा काटने का आदेश दिया।

भाषा सं राजेंद्र

राजकुमार

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