प्रस्तावित सचिवालय-विधानसभा परिसर को लेकर तटीय क्षेत्र में विरोध, राजनीतिक दलों का मछुआरों को समर्थन
प्रस्तावित सचिवालय-विधानसभा परिसर को लेकर तटीय क्षेत्र में विरोध, राजनीतिक दलों का मछुआरों को समर्थन
चेन्नई, 11 सितंबर (भाषा) तमिलनाडु सरकार के पट्टिनापक्कम में नए सचिवालय-विधानसभा परिसर के प्रस्ताव का स्थानीय मछुआरों ने जोरदार विरोध किया है और राजनीतिक दलों ने भी इसकी कड़ी आलोचना की है।
मछुआरा समुदाय के 12 गांवों के लोगों ने कहा है कि यदि सरकार 1,200 करोड़ रुपये की इस परियोजना को आगे बढ़ाती है तो वे बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन करेंगे।
तटीय गांवों के निवासियों, पर्यावरण कार्यकर्ताओं और राजनीतिक दलों के नेताओं ने परियोजना को तत्काल रोकने की मांग की है। उनका कहना था कि इससे आजीविका, स्थानीय बुनियादी ढांचे और तटीय पारिस्थितिकी पर गंभीर असर पड़ेगा।
पट्टिनापक्कम और मरीना लूप रोड क्षेत्र के लोगों का कहना है कि 26 एकड़ में प्रस्तावित यह परिसर उनके अस्तित्व के लिए सीधा खतरा है। यहां 1,500 से अधिक मछुआरा परिवार अपनी नौकाएं रखने, जालों की मरम्मत करने, मछली सुखाने और दैनिक बाजार चलाने के लिए इन पुश्तैनी जमीनों पर निर्भर हैं।
एक स्थानीय समुदाय प्रतिनिधि ने कहा, ‘हमारे पास इस जमीन से जुड़े कानूनी दस्तावेज और पुश्तैनी अधिकार हैं।’
निवासियों ने कहा, ‘निर्माण कार्य होने से समुद्र तक हमारी पहुंच बाधित हो जाएगी। जब ऊंचे स्तर के प्रशासनिक केंद्र बनते हैं, तो हमारी मौजूदगी को गंदगी फैलाने वाला या परेशानी का कारण माना जाने लगता है। हमें डर है कि हमें कन्नागी नगर जैसे दूर के इलाकों में विस्थापित कर दिया जाएगा, जिससे हमारा सामाजिक और आर्थिक ताना-बाना बर्बाद हो जाएगा।’
इस मुद्दे पर कई राजनीतिक दल एकजुट हो गए हैं और सभी ने मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय से स्थल बदलने की मांग की है। प्रमुख सहयोगी दल कांग्रेस ने उम्मीद जताई कि विजय स्थानीय समुदायों को ‘नुकसान’ पहुंचाए बिना इस संकट का समाधान करेंगे।
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के प्रदेश सचिव पी. षणमुगम ने मौजूदा स्थल का विरोध करते हुए राज्य सरकार पर नए सचिवालय के निर्माण के लिए जल्दबाजी में शासनादेश जारी करने का आरोप लगाया।
उन्होंने कहा, ‘नए सचिवालय और विधानसभा परिसर का निर्माण जल्दबाजी में नहीं किया जाना चाहिए। पट्टिनापक्कम में चुने गए स्थल के आसपास के मछुआरा गांव इस प्रस्ताव का विरोध कर रहे हैं। सरकार को उनकी चिंताओं को सुनना चाहिए।’
उन्होंने शुक्रवार को यहां संवाददाताओं से बातचीत में कहा कि सरकार को इस मुद्दे पर आम सहमति बनाने के लिए सर्वदलीय बैठक बुलानी चाहिए।
षणमुगम ने कहा, ‘सभी पक्षों के बीच सहमति के बाद ही उपयुक्त स्थान चुना जाना चाहिए। तब तक वर्तमान चयनित स्थल पर कोई काम नहीं किया जाना चाहिए।’
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के प्रदेश सचिव एम. वीरापांडियन ने भी परियोजना को तत्काल वापस लेने की मांग की है। उन्होंने कहा कि प्रस्तावित स्थल ‘ओलिव रिडले कछुओं’ के लिए संवेदनशील प्रजनन क्षेत्र है और समुद्री लहरों, चक्रवात तथा बाढ़ के लिहाज से बेहद संवेदनशील है।
तमिलनाडु कांग्रेस कमेटी (टीएनसीसी) के अध्यक्ष मणिक्कम टैगोर ने कहा कि नया सचिवालय जरूरी है, लेकिन उम्मीद है कि सरकार स्थल का इस तरह से आकलन करेगी जिससे ‘कम से कम विस्थापन’ हो और लोगों को ‘कम से कम नुकसान’ पहुंचे।
उन्होंने शुक्रवार को रामनाथपुरम में पत्रकारों से कहा कि उन्हें भरोसा है कि मौजूदा सरकार इस तरह से काम शुरू करेगी जिससे लोगों पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।
मछुआरा समुदाय के नेताओं ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार स्थल संबंधी आदेश वापस नहीं लेती है तो वे अपने घरों और तटीय अधिकारों की रक्षा के लिए व्यापक आंदोलन करेंगे।
भाजपा के मुख्य प्रवक्ता नारायणन तिरुपति ने सरकार के इस कदम को ‘शासन नहीं बल्कि छीनी गई जमीन पर अहंकार का प्रदर्शन’ करार देते हुए कहा कि नोचिकुप्पम से लेकर श्रीनिवासपुरम तक के परिवार पहले ही ‘लूप रोड’, यातायात के मार्ग बदलने, ‘ब्लू फ्लैग’ की दिखावटी सजावट और अदालत के समर्थन से चलाए गए ‘अतिक्रमण’ हटाने के अभियानों के कारण अपनी जमीन गंवा चुके हैं।
उन्होंने कहा, ‘जो सरकार मछुआरों को मरीना से हटाए बिना 25 एकड़ जमीन नहीं ढूंढ सकती, उसे 100 साल चलने वाले सचिवालय की बात करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।’
भाषा
शुभम नरेश
नरेश

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