राहुल युवाओं के मन को अपनी दूषित मानसिकता से विषाक्त न करें: विहिप

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राहुल युवाओं के मन को अपनी दूषित मानसिकता से विषाक्त न करें: विहिप

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  • Publish Date - August 23, 2026 / 03:52 PM IST,
    Updated On - August 23, 2026 / 03:52 PM IST

नयी दिल्ली, 23 अगस्त (भाषा) विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने मनुस्मृति संबंधी टिप्पणी और छात्राओं से “पितृसत्ता को ध्वस्त करने” की अपील करने के लिए कांग्रेस नेता राहुल गांधी की रविवार को आलोचना की। विहिप ने राहुल गांधी से कहा कि वह युवाओं के मन को अपनी दूषित मानसिकता से विषाक्त न करें।

विहिप ने गांधी से सवाल किया कि क्या वह अन्य धर्मों के ग्रंथों में महिलाओं के बारे में कही गई बातों को भी सार्वजनिक रूप से उद्धृत करने का साहस दिखाएंगे।

गांधी ने शनिवार को पुणे में अपने ‘छात्रों की गूंज’ जनसंपर्क कार्यक्रम के दौरान छात्राओं से बातचीत करते हुए मनुस्मृति के एक श्लोक का उल्लेख किया था जिसमें कहा गया है कि बचपन में महिला को पिता, युवावस्था में पति और पति की मृत्यु के बाद पुत्रों के अधीन रहना चाहिए।

गांधी ने कहा कि महिलाएं स्वयं के अधीन हैं और अपने पिता, पति या पुत्रों के नहीं। उन्होंने मनुस्मृति में जीवन के प्रत्येक चरण में महिला को उसके पुरुष रिश्तेदारों के अधीन रहने की व्यवस्था को “शर्मनाक” बताया।

इन टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया देते हुए विहिप के राष्ट्रीय प्रवक्ता विनोद बंसल ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, “राहुल गांधी जी, मनुस्मृति के एक श्लोक को उसके संदर्भ और अर्थ को समझे बिना चुनकर हिंदू समाज को कठघरे में खड़ा करना आपके लिए बहुत आसान है… देश के युवाओं के निर्मल मन को अपनी दूषित मानसिकता से विषाक्त न करें।”

बंसल ने गांधी को चुनौती दी कि वह कुरान, बाइबिल और अन्य अब्राहमिक धर्मग्रंथों में महिलाओं के बारे में कही गई बातों को भी सार्वजनिक रूप से उद्धृत करने का साहस दिखाएं। उन्होंने कहा कि गांधी को पहले पूरी मनुस्मृति पढ़नी चाहिए, संतों और भाष्यकारों के सानिध्य में बैठकर उसे समझना चाहिए और उसके बाद हिंदू समाज को प्रमाणपत्र देना चाहिए।

उन्होंने कहा, “चुनिंदा उद्धरण और उनके विकृत अर्थ राजनीति को दूषित कर सकते हैं, लेकिन सच्चाई इससे सामने नहीं आती।”

बंसल ने मनुस्मृति के एक अन्य श्लोक का हवाला देते हुए दावा किया कि नारी शक्ति देश की सभ्यता की पहचान रही है। उन्होंने कहा कि गांधी द्वारा राजनीतिक भाषणों के लिए इसे “मनुस्मृति बनाम संविधान” की लड़ाई में बदलना इतिहास और संस्कृति, दोनों के साथ अन्याय है।

भाषा अमित संतोष

संतोष