राज्यसभा समिति ने सदस्यों को संवैधानिक प्राधिकार को कमतर करने से रोकने के लिए दलों से मांगी राय
राज्यसभा समिति ने सदस्यों को संवैधानिक प्राधिकार को कमतर करने से रोकने के लिए दलों से मांगी राय
(दीपक रंजन)
नयी दिल्ली, 30 सितंबर (भाषा) संसदीय प्रक्रियाओं, नियमों और शिष्टाचार के मानदंडों की अनदेखी की बढ़ती घटनाओं पर पर चिंतित राज्यसभा की आचार समिति ने आचार संहिता की समीक्षा पर राजनीतिक दलों से राय मांगी है।
आचार समिति ने राजनीतिक दलों से जानना चाहा है कि क्या आचार संहिता में ऐसे स्पष्ट प्रावधान शामिल किए जाने चाहिए जिनके तहत सदस्य सदन, सार्वजनिक या डिजिटल प्लेटफॉर्म पर दिए जाने वाले बयानों में संवैधानिक प्राधिकार या साथी सदस्यों की गरिमा को कम करने से बचें।
विधायिकाओं में कार्यवाही बाधित होने और स्थापित संसदीय परंपराओं की अनदेखी के बढ़ते चलन पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए आचार समिति ने राजनीतिक दलों, राज्य विधानसभाओं और अंतरराष्ट्रीय संसदीय निकायों सहित विभिन्न हितधारकों के साथ व्यापक विचार-विमर्श के माध्यम से आचार संहिता की समीक्षा करने का निर्णय लिया है।
राज्यसभा सदस्यों के लिए आचार संहिता की समीक्षा के विषय पर आचार समिति ने राजनीतिक दलों से विभिन्न प्रश्न किए हैं। एक सवाल में पूछा गया है कि सदस्यों को संवेदनशील या विवादास्पद विषयों – जैसे राष्ट्रीय नायकों, ऐतिहासिक हस्तियों और इतिहास की विवादास्पद व्याख्याओं – पर बोलते समय अधिक सावधानी, संयम और संवेदनशीलता बरतने के लिए कैसे प्रोत्साहित किया जा सकता है?
समिति ने कहा है कि इस प्रकार की सावधानी बरतना ऐसी परिस्थितियों में और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जहां ऐसी बातों से साथी सदस्यों, मंत्रियों या अन्य सार्वजनिक हस्तियों सहित दूसरों की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचने की आशंका होती है।
समिति ने पूछा, ‘इस विषय पर किस तरह की जवाबदेही तय की जानी चाहिए और क्या संवेदनशील मुद्दों पर बहस में भाग लेने वाले सदस्यों के लिए आचार संहिता में विशेष प्रावधान शामिल किए जाने चाहिए?’
प्रश्नावली में आगे पूछा गया है, ‘क्या आचार संहिता में साफ़ तौर पर यह बात शामिल की जानी चाहिए कि सदस्य संसदीय कार्यवाही के दौरान अभिव्यक्ति की आज़ादी का गलत इस्तेमाल न करें? और अगर ऐसा होता है तो संहिता के नियमों के उल्लंघन के मामलों में किस तरह की सुधारात्मक या अनुशासनात्मक कार्रवाई उचित होगी?’
राज्यसभा के तत्कालीन सभापति जगदीप धनखड़ ने मार्च 2025 में सदन की आचार समिति को निर्देश दिया था कि वह आचार विषय पर 1998 की एस. बी. चव्हाण समिति की रिपोर्ट की समीक्षा करे और हाल के तकनीकी विकास और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव को ध्यान में रखते हुए सदस्यों के लिए अद्यतन दिशानिर्देश तैयार करे।
आचार समिति ने राजनीतिक दलों से पूछा कि क्या आचार संहिता में ऐसे स्पष्ट प्रावधान होने चाहिए जिनके तहत सदस्य सदन में या सार्वजनिक या डिजिटल प्लेटफॉर्म पर दिए गए बयानों के ज़रिए संवैधानिक संस्थाओं या साथी सदस्यों की गरिमा को कम करने से बचें।
गौरतलब है कि कांग्रेस समेत विपक्ष, संसद में चुनाव आयोग और उसके आयुक्तों के कामकाज पर सवाल उठा रहा है। वहीं, सरकार का कहना है कि सांसद, संसद में भारत के चुनाव आयोग पर चर्चा नहीं कर सकते।
राज्यसभा की आचार समिति ने अपनी प्रश्नावली में यह भी सवाल किया है कि क्या संसदीय कार्यवाही के दौरान असंसदीय भाषा के इस्तेमाल को रोकने के लिए और कड़े नियम लागू किए जाने चाहिए?
सवाल किया गया है ‘सदस्य सदन में अनुचित या अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल न करें, यह सुनिश्चित करने के लिए आप किन खास कदमों की सिफारिश करेंगे?
समिति ने पूछा है , ‘क्या आपको लगता है कि राज्यसभा सदस्यों के लिए आचार संहिता का मौजूदा दायरा और अधिकार-क्षेत्र, सदन के अंदर और बाहर सदस्यों से अपेक्षित आज के नैतिक और व्यवहार संबंधी मानकों को पर्याप्त रूप से पूरा करता है? कृपया इस बारे में अपने विचार उचित कारणों के साथ बताएं।’’
उल्लेखनीय है कि सांसद घनश्याम तिवारी की अध्यक्षता में राज्यसभा की आचार समिति ने 20 जनवरी, 28 अप्रैल और 10 जुलाई 2026 को आचार संहिता की समीक्षा और विभिन्न राजनीतिक दलों को भेजी गयी प्रश्नावली के विषय पर भविष्य की कार्रवाई के बारे में चर्चा की थी।
भाषा दीपक नरेश
नरेश

Facebook


