नयी दिल्ली, 31 मई (भाषा) पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव के रूप में इस सप्ताह सेवानिवृत्त हुए एम. रविचंद्रन अब भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), मद्रास में संकाय सदस्य के रूप में अकादमिक क्षेत्र में वापसी करने जा रहे हैं।
पृथ्वी विज्ञान सचिव के रूप में 29 मई को पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा करने वाले रविचंद्रन की योजना देश के इस प्रतिष्ठित संस्थान में महासागर विज्ञान से अपना जुड़ाव बनाए रखने का है। उनका करियर संघर्ष, दृढ़ संकल्प और परिश्रम का उदाहरण रहा है।
सचिव के रूप में उन्होंने भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के आधुनिकीकरण कार्यक्रम का नेतृत्व किया और सरकार के महत्वाकांक्षी ‘डीप ओशन मिशन’ को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
भारतीय उष्णदेशीय मौसम विज्ञान संस्थान, पुणे (आईआईटीएम) से भौतिकी में पीएचडी करने वाले रविचंद्रन ने राष्ट्रीय महासागर प्रौद्योगिकी संस्थान, चेन्नई और फिर भारतीय राष्ट्रीय महासागर सूचना सेवा केंद्र, हैदराबाद में कार्यकाल के दौरान महासागर अवलोकन प्रणालियों के डिजाइन और क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
रविचंद्रन (61) तमिलनाडु के तत्कालीन मदुरै जिले के छोटे से गांव भद्रकालीपुरम के रहने वाले हैं, जहां पांचवीं कक्षा के बाद पढ़ाई जारी रखने वाले छात्र बहुत कम थे।
उन्होंने बताया कि गांव से आगे पढ़ने का सपना देखने वाले वह पहले छात्र थे और पूरे गांव ने उनके सपने को पूरा करने में मदद की। 1975 में वह डिंडीगुल के एक उच्च विद्यालय में पढ़ने गए, मैट्रिक पास की और बाद में मदुरै के एक कॉलेज से स्नातक की डिग्री हासिल की।
छात्रवृत्तियों और समुदाय के सहयोग की बदौलत उन्होंने अलगप्पा विश्वविद्यालय, कराईकुड़ी से भौतिकी में परास्नातक (एमएससी) किया और अपने गांव के पहले स्नातकोत्तर बने।
लेकिन जल्द ही उन्हें वास्तविकता का सामना करना पड़ा। कमजोर संवाद कौशल के कारण वह सरकारी नौकरी हासिल नहीं कर सके।
रविचंद्रन ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘मैं परीक्षाएं पास करने में माहिर था और रट्टा मारकर पढ़ाई करता था। लेकिन जब साक्षात्कार की बात आती थी तो मैं पूरी तरह असफल साबित होता था।’’
गांव वालों के तानों से परेशान होकर वह चेन्नई चले गए और एक रासायनिक कारखाने में सुरक्षा गार्ड की नौकरी करने लगे।
कुछ महीनों बाद उनके कुछ सहपाठियों ने उन्हें वहां देखा और तमिलनाडु सरकार द्वारा संचालित सिविल सेवा अभ्यर्थियों की कोचिंग में दाखिला लेने के लिए प्रेरित किया।
उन्होंने याद करते हुए कहा, ‘‘मेरे लिए उस कार्यक्रम में शामिल होने की सबसे बड़ी वजह दिन में तीन समय का भोजन और चेन्नई में रहने की जगह थी।’’
रविचंद्रन ने प्रवेश परीक्षा आसानी से पास कर ली, लेकिन वहां उन्हें एहसास हुआ कि केवल रटकर पढ़ाई करने की अपनी सीमाएं होती हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘एमएससी की डिग्री लेने के बाद भी भौतिकी के बुनियादी सिद्धांत मेरे लिए स्पष्ट नहीं थे।’’
इसी दौरान उनके मार्गदर्शक और चेन्नई के प्रेसिडेंसी कॉलेज के पूर्व प्रोफेसर आर. स्वामीनाथन ने उनकी सोच बदल दी। स्वामीनाथन ने उन्हें छठी कक्षा की भौतिकी की पुस्तकों से दोबारा शुरुआत कर मजबूत वैचारिक आधार तैयार करने की सलाह दी।
रविचंद्रन ने 1988 में सिविल सेवा परीक्षा पास कर ली, लेकिन जिस सीमा शुल्क सेवा के लिए उनका चयन हुआ, उसमें उनकी विशेष रुचि नहीं थी।
उसी समय उन्हें भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के माध्यम से पुणे स्थित आईआईटीएम में वैज्ञानिक के रूप में शामिल होने का अवसर मिला।
उन्होंने कहा, ‘‘23 दिसंबर 1988 को मैं आईआईटीएम-पुणे का हिस्सा बना और वहीं से मेरी जिंदगी ने एक नया मोड़ लिया।’’
अक्टूबर 2021 से लेकर सेवानिवृत्ति तक पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव के रूप में सफल कार्यकाल पूरा करने के बाद अब रविचंद्रन भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, मद्रास के ‘स्कूल ऑफ इंटरडिसिप्लिनरी स्टडीज’ में संकाय सदस्य के रूप में शामिल होने और भारत के महासागर विज्ञान अभियानों में अपना योगदान जारी रखने की योजना बना रहे हैं।
भाषा गोला नेत्रपाल
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