नयी दिल्ली, 16 जुलाई (भाषा) राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) ने बृहस्पतिवार को कहा कि गंगा को स्वच्छ बनाए रखने के लिए केवल नदी किनारे बसे शहरों में ही नहीं, बल्कि पूरे गंगा नदी बेसिन के शहरों में भी प्रदूषण नियंत्रण के प्रभावी उपाय करना आवश्यक है, क्योंकि इन क्षेत्रों का अपशिष्ट जल अंततः गंगा नदी में ही पहुंचता है।
मिशन ने ‘नमामि गंगे’ कार्यक्रम के तहत मेरठ में किए जा रहे कार्यों का उदाहरण देते हुए यह बात कही।
एनएमसीजी ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, ‘‘मेरठ गंगा की मुख्य धारा के किनारे स्थित नहीं है। यहां से गंगा दिखाई भी नहीं देती। फिर भी यहां के हर नाले और हर सीवर लाइन का पानी अंततः उसी गंगा नदी में जाकर मिलता है। नदी विज्ञान की भाषा में इसे ‘बेसिन’ कहा जाता है और सच्चाई यह है कि गंगा तभी स्वच्छ रह सकती है, जब उसका पूरा बेसिन स्वच्छ होगा।’’
मिशन ने कहा, ‘‘यदि गंगा के तट पर बसे शहरों का तो सौंदर्यीकरण कर दिया जाए, लेकिन बेसिन के अन्य शहरों की उपेक्षा की जाए, तो प्रदूषण अंततः घूम-फिरकर नदी तक पहुंच ही जाएगा। यही कारण है कि ‘नमामि गंगे’ पहल मेरठ तक पहुंची।’’
एनएमसीजी के अनुसार, तेजी से हुए शहरीकरण के बीच मेरठ कई दशकों से सीमित सीवर नेटवर्क की समस्या से जूझ रहा था और शहर का अपशिष्ट जल प्रबंधन बढ़ती आबादी और विस्तार की गति के अनुरूप विकसित नहीं हो सका।
इस चुनौती से निपटने के लिए 2020 में 691 करोड़ रुपये की लागत वाली सीवर परियोजना को मंजूरी दी गई। इस परियोजना का निर्माण कार्य वर्ष 2024 में शुरू हुआ और अभी जारी है।
परियोजना के तहत प्रतिदिन 220 मिलियन लीटर (220 एमएलडी) अपशिष्ट शोधन क्षमता विकसित करने, आधुनिक सीवर शोधन संयंत्र (एसटीपी) स्थापित करने, व्यापक सीवर नेटवर्क तैयार करने, वैज्ञानिक तरीके से अपशिष्ट जल का प्रबंधन करने तथा उपचारित जल के पुन: उपयोग को बढ़ावा देने का लक्ष्य रखा गया है।
एनएमसीजी ने कहा कि शहर के अधिक से अधिक क्षेत्रों को सीवर नेटवर्क से जोड़कर यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि मेरठ का अपशिष्ट जल बिना शोधन के गंगा नदी तंत्र में न पहुंचे।
मिशन ने कहा, ‘‘जब बेसिन का इतना बड़ा शहर पानी की हर बूंद का वैज्ञानिक ढंग से प्रबंधन करने लगेगा, तो उसका प्रभाव गंगा की मुख्य धारा में काफी दूर तक दिखाई देगा। गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि एक संपूर्ण नदी तंत्र है और किसी भी तंत्र में बदलाव तभी संभव है, जब उससे जुड़े प्रत्येक शहर में बदलाव आए।’’
भाषा गोला नरेश
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