आरएसएस गंगा जैसा, समाज कल्याण के लिए 100 साल से निस्वार्थ भाव से कार्यरत: उपराष्ट्रपति

आरएसएस गंगा जैसा, समाज कल्याण के लिए 100 साल से निस्वार्थ भाव से कार्यरत: उपराष्ट्रपति

आरएसएस गंगा जैसा, समाज कल्याण के लिए 100 साल से निस्वार्थ भाव से कार्यरत: उपराष्ट्रपति
Modified Date: July 17, 2026 / 10:35 pm IST
Published Date: July 17, 2026 10:35 pm IST

नयी दिल्ली, 17 जुलाई (भाषा) उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने शुक्रवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की तुलना गंगा नदी से करते हुए कहा कि यह संगठन पिछली एक सदी से दूसरों की भलाई के लिए निस्वार्थ भाव से काम कर रहा है।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि बहुत साधारण शुरुआत के बाद यह संगठन दुनिया के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठनों में से एक बन गया है।

यहां उपराष्ट्रपति आवास पर ‘आरएसएस के 100 साल: सेवा, एकता और त्याग की एक सदी’ नामक पुस्तक के विमोचन के मौके पर राधाकृष्णन ने कहा कि संघ की 100वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में जारी इस पुस्तक के कार्यक्रम में शामिल होना उनके लिए व्यक्तिगत रूप से सम्मान की बात है, क्योंकि वे लंबे समय से संघ से जुड़े रहे हैं।

आरएसएस पर लिखी एक तमिल कविता का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि अक्सर इस संगठन की तुलना गंगाजी से की जाती है, जो दूसरों की भलाई के लिए निस्वार्थ भाव से बहती हैं।

उन्होंने कहा, ‘‘संघ गंगा की तरह है। जिस तरह गंगा बदले में कुछ भी उम्मीद किए बिना दूसरों की भलाई के लिए बहती रहती है, उसी तरह आरएसएस ने भी अपनी सौ साल की यात्रा के दौरान सेवा की भावना से अपना काम जारी रखा है।’’

उन्होंने कहा, ‘‘गंगा की तरह, जो एक छोटी सी धारा से शुरू होकर एक विशाल नदी बन जाती है, आरएसएस की शुरुआत भी बहुत साधारण तरीके से हुई थी और आज यह दुनिया के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठनों में से एक बन गया है।’’

किताब के लेखकों, श्याम जाजू और अनुपम त्रिवेदी को बधाई देते हुए राधाकृष्णन ने कहा कि उन्होंने किताब में संगठन के मूल्यों को बखूबी पेश किया है।

उन्होंने कहा, ‘‘संघ का सफर भारत की सांस्कृतिक जड़ों, विरासत और परंपराओं को फिर से जीवित करने, मजबूत करने और उनका पुनर्निर्माण करने का रहा है।’’

किताब के शीर्षक का जिक्र करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि सेवा, एकता और त्याग के आदर्शों ने आरएसएस के स्वयंसेवकों की कई पीढ़ियों को प्रेरित किया है।

उन्होंने कहा, ‘‘सेवा समाज के प्रति निस्वार्थ समर्पण को दर्शाती है, एकता उन बंधनों को मजबूत करती है जो भारत की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता से परे हैं, और त्याग हमें याद दिलाता है कि स्थायी संस्थान समर्पण, दृढ़ता और निस्वार्थ प्रयासों से बनते हैं।’’

उन्होंने कहा, ‘‘शताब्दी समारोह लाखों स्वयंसेवकों के समर्पण की प्रशंसा का मौका है। संस्थान तभी टिके रहते हैं जब उन्हें आम लोगों की खुद से बढ़कर किसी मकसद के लिए काम करने की इच्छाशक्ति,विश्वास और प्रतिबद्धता का सहारा मिलता है।’’

‘प्रधानमंत्री के रूप में एक स्वयंसेवक: मोदी युग’ नाम के अध्याय का जिक्र करते हुए राधाकृष्णन ने कहा कि यह किताब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के एक स्वयंसेवक से ‘प्रधान सेवक’ बनने के सफर को दिखाती है।

उन्होंने कहा, ‘‘प्रधानमंत्री ने हमेशा ‘सेवा’ और ‘राष्ट्र प्रथम’ के सिद्धांत को शासन के केंद्र में रखा है, जो निस्वार्थ सेवा और राष्ट्र-निर्माण पर आरएसएस के लगातार बल दिए जाने को दर्शाता है।’’

उपराष्ट्रपति ने कहा कि आरएसएस ने भारत की सांस्कृतिक विरासत, विविध परंपराओं, भाषाओं और आध्यात्मिक विचारों के प्रति गर्व की भावना जगाकर लगातार सांस्कृतिक निरंतरता और राष्ट्रीय चेतना को बढ़ावा दिया है।

उन्होंने कहा कि 100 साल पूरे होना न केवल संगठन की यात्रा का जश्न मनाने का मौका है, बल्कि इसके स्वयंसेवकों के समर्पण को पहचानने का भी अवसर है।

कार्यक्रम के दौरान आरएसएस के महासचिव दत्तात्रेय होसबाले का संदेश भी पढ़कर सुनाया गया, जो खुद कार्यक्रम में शामिल नहीं हो सके थे।

अपने संदेश में, होसबाले ने आरएसएस की सदी भर की यात्रा को दर्ज करने के लिए लेखकों को बधाई दी और कहा कि यह किताब संगठन के बारे में जानकारीपूर्ण विवरण देती है, कई गलतफहमियों को दूर करती है और इसमें संघ के कम ज्ञात पहलुओं को उजागर करने वाले कई किस्से भी शामिल हैं।

उन्होंने भरोसा जताया कि आरएसएस को समझने के इच्छुक पाठक इस किताब को खूब पसंद करेंगे।

इस कार्यक्रम में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष राम बहादुर राय, पुस्तक के सह-लेखक श्याम जाजू और अनुपम त्रिवेदी और अन्य लोग उपस्थित थे।

भाषा संतोष पवनेश

पवनेश


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