नयी दिल्ली, 14 जनवरी (भाषा) उपग्रह से प्राप्त चित्रों पर आधारित वैश्विक वन डेटासेट का उपयोग करके तैयार किये गए मानचित्रों में ‘वन’ के स्थान का निर्धारण केवल 26 प्रतिशत बार ही सटीक पाया गया। एक नए अध्ययन के अनुसार, यह विसंगति जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता हानि और गरीबी से निपटने के प्रयासों को कमजोर कर सकती है, जिनके लिए वन मानचित्र अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
अमेरिका के ‘नोट्रे डेम विश्वविद्यालय’ सहित अन्य संस्थाओं के शोधकर्ताओं ने कहा कि वनों में संग्रहित कार्बन की मात्रा या वनों के निकट रहने वाले गरीब लोगों की संख्या से जुड़े अनुमानों में काफी अंतर हो सकता है, कभी-कभी यह अंतर 10 गुना तक हो सकता है।
उन्होंने कहा कि यह विसंगति जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता में हानि और गरीबी से निपटने में काफी अनिश्चितता पैदा कर सकती है, जिनके लिए वन मानचित्र अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
‘वन अर्थ’ पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन में लेखकों ने लिखा, ‘‘जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता हानि और गरीबी के तिहरे संकट से निपटने के लिए वन आवश्यक हैं।’’
शोधकर्ताओं ने कहा, ‘‘दस वैश्विक वन डेटासेट केवल 26 प्रतिशत मानचित्रित वन क्षेत्र पर सहमत थे।’’
अध्ययन के सह-लेखक और यूनिवर्सिटी ऑफ नोट्रे डेम के स्कूल ऑफ ग्लोबल अफेयर्स में एसोसिएट प्रोफेसर डैनियल सी. मिलर ने कहा, “जब ज़मीन को ऊपर से देखा जाता है, तो वैश्विक स्तर पर यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि कोई क्षेत्र जंगल है या नहीं। कुछ लोग पेड़ों के छोटे से हिस्से को भी जंगल मान सकते हैं, जबकि दूसरों के लिए केवल पेड़ों का बड़ा और घना क्षेत्र ही जंगल कहलाएगा।”
भाषा संतोष पवनेश
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