न्यायालय ने पूर्व पुलिसकर्मी को राष्ट्रपति वीरता पदक देने के मामले में केंद्र के रुख पर नाराजगी जताई
न्यायालय ने पूर्व पुलिसकर्मी को राष्ट्रपति वीरता पदक देने के मामले में केंद्र के रुख पर नाराजगी जताई
नयी दिल्ली, 20 जुलाई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को केंद्र सरकार द्वारा मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के उस निर्देश का पालन न किए जाने पर नाराजगी जताई, जिसमें एक पूर्व पुलिस अधिकारी को प्रतिष्ठित ‘राष्ट्रपति वीरता पुरस्कार’ देने को कहा गया था। इस अधिकारी ने दो दशक से अधिक समय पहले एक अभियान के दौरान दो डकैतों को मार गिराया था।
न्यायमूर्ति विक्रमनाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन की अर्जी पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार को पुलिस अधिकारी विवेक सिंह चौहान को पुरस्कार देने के उच्च न्यायालय के आदेश का पालन करने के लिए 29 जुलाई तक का समय दिया।
केंद्र का प्रतिनिधित्व कर रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ को बताया कि सरकार ने उच्चतम न्यायालय के 25 मार्च के उस आदेश के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर की है, जिसमें उच्च न्यायालय के निर्देश को बरकरार रखा गया था।
मेहता ने कहा, ‘‘हमने पुनर्विचार के लिए याचिका दायर की है। यह सिद्धांत के आधार पर एक आपत्ति है, न कि किसी अधिकारी के खिलाफ। अगर न्यायालय पुनर्विचार याचिका पर विचार करता है, तो हम कोई रास्ता निकाल सकते हैं। हो सकता है कि उन्हें यह मिल जाए, लेकिन अदालत के आदेश के जरिये नहीं।’’
पीठ ने मेहता से पूछा, ‘‘आप आदेश का पालन क्यों नहीं करते, और तब पुनर्विचार के लिए दलील दें।’’ इसने कहा कि यदि पुनर्विचार याचिका स्वीकार हो जाती है, तो पुरस्कार रद्द हो जाएगा।
न्यायमूर्ति नाथ ने मेहता से पूछा, ‘‘आप पालन क्यों नहीं कर सकते? आप इसे मुद्दा क्यों बना रहे हैं?’’
सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि यदि पुनर्विचार याचिका स्वीकार हो जाती है, तो पुरस्कार वापस लिया जा सकता है, और यह मामला किसी व्यक्ति विशेष के बजाय सिद्धांत का अधिक है।
उन्होंने कहा कि इस मामले का अधिकारी की रैंक से कोई लेना-देना नहीं है और अनुरोध किया कि पुनर्विचार याचिका को मौखिक सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाए।
पूर्व पुलिस अधिकारी की ओर से पेश वकील ने कहा कि उनका मुवक्किल 23 साल से न्याय का इंतजार कर रहा है। उन्होंने दलील दी कि अधिकारियों को पहले ही अदालत की अवमानना का दोषी ठहराया जा चुका है और अब सिर्फ़ सज़ा तय की जानी बाकी है। उन्होंने अदालत से तुरंत अनुपालन का निर्देश दिए जाने का आग्रह किया।
हालांकि, पीठ ने केंद्र सरकार को एक आखिरी मौका दिया और इस मामले पर फ़ैसला लेने के लिए एक हफ़्ते का समय दिया। पीठ ने सॉलिसिटर जनरल से कहा, ‘‘कृपया सरकार को बता दें कि अदालत इससे खुश नहीं है।’’
पीठ ने मामले को 29 जुलाई को सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया तथा साथ ही यह भी कहा कि ‘‘अब और समय नहीं दिया जाएगा’’।
मेहता ने कहा कि सम्मान प्रदान किए जाते हैं, न कि न्यायिक निर्देशों के माध्यम से उनका दावा किया जाता है।
न्यायमूर्ति नाथ ने जवाब देते हुए कहा कि अदालत को इस बात का भी ध्यान रहता है कि आदेश कहां जारी करना है और कहां नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि उच्च न्यायालय ने अगर ऐसा निर्देश दिया है, तो ज़रूर इसके पीछे कोई ठोस वजह रही होगी।
पीठ ने कहा, ‘‘या तो आप बयान दें या फिर आदेश को नजरअंदाज करें; ऐसे में हम 15 अगस्त को खुद ही पुरस्कार देंगे।’’
इसने कहा कि उच्च न्यायालय के आदेश के ख़िलाफ़ अपील पहले ही खारिज हो चुकी है और अब सरकार को उस निर्देश का पालन करना चाहिए।
गृह सचिव ने मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के उस आदेश के खिलाफ उच्चतम न्यायालय का रुख किया है, जिसमें उन्हें एक पुलिस अधिकारी को राष्ट्रपति वीरता पदक देने के निर्देश का पालन न करने पर प्रथम दृष्टया अवमानना का दोषी ठहराया गया था।
अवमानना का यह मामला केंद्र सरकार द्वारा उच्च न्यायालय के नौ दिसंबर, 2024 के उस निर्देश का पालन न करने के कारण उत्पन्न हुआ है, जिसमें सरकार से चौहान को एक महीने के भीतर वीरता पुरस्कार देने के लिए कहा गया था।
चौहान 2003 में ग्वालियर ज़िले के घाटीगांव थाने के प्रभारी थे। उन्होंने एक गांव में डकैतों की मौजूदगी की खुफिया जानकारी मिलने के बाद उनके ख़िलाफ़ एक अभियान का नेतृत्व किया था।
मुठभेड़ में दो डकैत मारे गए थे। इस दौरान चौहान खुद भी घायल हो गए थे।
मजिस्ट्रेट जांच में क्लीन चिट मिलने के बाद, उन्हें समय से पहले पदोन्नति देने और वीरता के लिए राष्ट्रपति पुलिस पदक देने की सिफारिश की गई थी।
मध्यप्रदेश सरकार ने 2019 में उनके नाम की सिफारिश की थी, लेकिन उसी साल बाद में गृह मंत्रालय ने इस दावे को खारिज कर दिया। इसके बाद उच्च न्यायालय से लेकर उच्चतम न्यायालय तक कानूनी लड़ाई का एक और दौर चला, तथा उच्च न्यायालय ने अवमानना की कार्रवाई भी की।
अदालत की अवमानना की कार्यवाही के दौरान, केंद्र सरकार ने अनुपालन रिपोर्ट पेश की, जिसमें बताया गया कि राष्ट्रपति ने चौहान के लिए वीरता पदक को मंज़ूरी दे दी है।
उच्च न्यायालय ने इस फैसले को ‘‘अपर्याप्त’’ बताया और कहा कि वीरता पदक तथा राष्ट्रपति वीरता पदक अलग-अलग सम्मान हैं। इसने कहा कि राष्ट्रपति वीरता पदक एक उच्च सम्मान है, जबकि वीरता पदक एक साथ कई कर्मियों को दिया जाता है।
भाषा
नेत्रपाल सुरेश
सुरेश

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