नयी दिल्ली, 23 जनवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को केंद्र, तेलंगाना, सीबीआई, ईडी और एसएफआईओ से उस याचिका पर जवाब मांगा, जिसमें राज्य के अधिकारियों और न्यायपालिका के एक उच्च पदस्थ सदस्य की कथित मिलीभगत से जुड़े करोड़ों रुपये के कॉरपोरेट धोखाधड़ी मामले की स्वतंत्र जांच का अनुरोध किया गया है।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने वकील अश्विनी उपाध्याय की दलीलों पर गौर किया और गृह मंत्रालय, वित्त, विधि एवं न्याय तथा कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय सहित विभिन्न केंद्रीय मंत्रालयों को नोटिस जारी किए।
इसने केंद्रीय जांच एजेंसियों, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई), प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय (एसएफआईओ) को भी नोटिस जारी किए।
‘बंगाल कोल्ड रोलर्स प्राइवेट लिमिटेड’ के निदेशक सौरभ अग्रवाल की याचिका में कहा गया है कि एक सुनियोजित साजिश के तहत दिवालिया कंपनी के निलंबित प्रबंधन ने कथित तौर पर लगभग 150 करोड़ रुपये की हेराफेरी की और दिवाला एवं शोधन अक्षमता की कार्यवाही को 30 महीने से अधिक समय तक टालने के लिए उच्चस्तरीय ‘‘न्यायिक प्रभाव’’ का इस्तेमाल किया।
याचिका में चेन्नई स्थित राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) की कार्यवाही का भी उल्लेख किया गया है।
इसमें कहा गया कि एनसीएलएटी सदस्य न्यायमूर्ति शरद कुमार शर्मा ने एक चौंकाने वाला खुलासा करने के बाद खुली अदालत में स्वयं को इस मामले से अलग कर लिया, जिसमें उन्होंने बताया था कि एक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने कथित तौर पर उनसे संपर्क कर देनदार कंपनी ‘मेसर्स केएलएसआर इंफ्राटेक लिमिटेड’ के निलंबित निदेशकों के पक्ष में ‘‘अनुकूल आदेश’’ देने का अनुरोध किया था।
याचिका में दावा किया गया कि उक्त कंपनी के निलंबित प्रबंधन ने धोखाधड़ी करके विभिन्न बैंकों से 148.87 करोड़ रुपये का ऋण प्राप्त किया था।
आरोप है कि कंपनी ने दिवाला एवं शोधन अक्षमता कार्यवाही की अवधि के दौरान अस्थायी समाधान पेशेवर (आईआरपी) की अनुमति के बिना लगभग 6,000 करोड़ रुपये की सरकारी निविदाएं हासिल कीं।
भाषा
शफीक सुरेश
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