नयी दिल्ली, 18 सितंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को महाराष्ट्र जहर नियमावली के उन प्रावधानों को रद्द कर दिया, जिनके तहत गैर-दवा निर्माताओं को मेथनॉल बेचने से पहले उसमें खास रंग और कड़वा स्वाद मिलाने की शर्त थी ताकि जहरीली शराब से होने वाली त्रासदियों को रोका जा सके।
इसके साथ ही न्यायालय ने कहा कि ऐसी पाबंदियां मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती हैं और शराब पर पूर्ण रोक लगाने से अक्सर इसका गैर-कानूनी कारोबार होने लगता है।
न्यायालय ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को जहरीली शराब से होने वाली त्रासदियों को रोकने के लिए कई उपाय सुझाए और नकली शराब के उत्पादन, परिवहन और बिक्री पर रोक के लिए समन्वित, बहु-विभागीय दृष्टिकोण अपनाने को कहा।
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि महाराष्ट्र जहर नियमावली में 2011 की अधिसूचना के ज़रिए जोड़े गए नियम 18ए और 18बी संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और 19(1)(जी) (पेशा चुनने का अधिकार) का उल्लंघन करते हैं।
राज्य सरकार ने ये प्रावधान 1991 की ज़हरीली शराब त्रासदी के बाद जोड़े थे, जिसमें मुंबई के अंधेरी इलाके में छाया बार से खरीदी गई नकली शराब पीने से लगभग 250 लोगों की मौत हो गई थी।
पीठ ने कहा, ‘‘जिन लोगों ने शराब पी थी, उन्हें नहीं पता था कि उन्होंने जो पिया है वह मेथनॉल है, जो ज़हर से कम नहीं है। नतीजतन, लगभग 93 लोगों की जान चली गई।’’
फैसला लिखने वाले न्यायमूर्ति पारदीवाला ने कहा, ‘‘इस मामले में, हमारा सरोकार जहरीली शराब त्रासदी के बाद मेथनॉल को बेस्वाद और पहचानने में मुश्किल बनाने के लिए प्रशासन द्वारा अपनाए गए उपायों से है…। ’’
पीठ ने कहा कि मेथनॉल में कड़वाहट या रंग मिलाने से पीने की लत खत्म नहीं होगी। इसे आसानी से मिलने से रोकने के लिए, कानूनों के तहत परिवहन और भंडारण के लिए सख्त नियम होने चाहिए। उसने कहा कि मौजूदा कदम पूरे उद्योग को ही खतरे में डाल देगा और इससे ‘असल मकसद ही पीछे छूट जाएगा’।
भाषा अविनाश नरेश
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