आईटी नियमों को रद्द करने संबंधी अदालत के फैसले के खिलाफ केंद्र की याचिका पर विचार करेंगे: न्यायालय

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आईटी नियमों को रद्द करने संबंधी अदालत के फैसले के खिलाफ केंद्र की याचिका पर विचार करेंगे: न्यायालय

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  • Publish Date - March 10, 2026 / 02:08 PM IST,
    Updated On - March 10, 2026 / 02:08 PM IST

नयी दिल्ली, 10 मार्च (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि वह सोशल मीडिया पर फर्जी और झूठी सामग्री को विनियमित करने के उद्देश्य से सूचना प्रौद्योगिकी नियमों में सरकार द्वारा 2023 में किये गए संशोधनों को रद्द करने संबंधी मुंबई उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार की याचिका पर विचार करेगा।

शीर्ष अदालत ने हालांकि 2024 के मुंबई उच्च न्यायालय के फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया, जिसमें न केवल संशोधित सूचना प्रौद्योगिकी नियमों को रद्द कर दिया गया था बल्कि उन्हें ‘‘असंवैधानिक’’ भी करार दिया गया था।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत तथा न्यायमूर्ति आर महादेवन और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कॉमेडियन कुणाल कामरा, एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया और एसोसिएशन ऑफ इंडियन मैगजीन्स सहित मूल याचिकाकर्ताओं को नोटिस जारी किया।

उच्च न्यायालय के फैसले पर रोक लगाने से इनकार करते हुए प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि बेहतर होगा कि इस पूरे मामले का अंतिम निर्णय आ जाए।

मुंबई उच्च न्यायालय ने 26 सितंबर 2024 को सरकार के खिलाफ सोशल मीडिया पर फर्जी और भ्रामक सामग्री का पता लगाने और विनियमन के उद्देश्य से संशोधित सूचना प्रौद्योगिकी नियमों को औपचारिक रूप से रद्द कर दिया था।

सुनवाई के दौरान, केंद्र सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगाने का अनुरोध करते हुए दलील दी कि सरकार का इरादा ‘‘सामग्री को पूरी तरह से रोकना’’ नहीं था, बल्कि गलत सूचना को विनियमित करना था।

प्रधान न्यायाधीश ने सोशल मीडिया मंचों की वर्तमान स्थिति पर चिंता व्यक्त की।

प्रधान न्यायाधीश ने विशेष रूप से भारतीय सेना और राष्ट्रीय नीतियों से संबंधित फर्जी संदेशों की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘जिस तरह से आजकल इनमें से कुछ (सोशल मीडिया) प्लेटफॉर्म व्यवहार कर रहे हैं… रिकॉर्ड पर रखे गए उदाहरणों को देखिए, वे कितने खतरनाक तरीके से काम करते हैं।’’

उन्होंने कहा कि क्या मौजूदा प्रणाली मध्यस्थों पर दायित्व डाले बिना पूरा भार मशीनरी पर डाल रही है।

प्रतिवादियों में से एक की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने कहा कि मौजूदा नियमों के तहत 24 घंटे के भीतर सामग्री को हटाने की अनुमति है। उन्होंने कहा कि 2023 के संशोधन त्रुटिपूर्ण थे क्योंकि ‘‘भ्रामक जानकारी’’ को परिभाषित नहीं किया गया था।

दातार ने कहा, ‘‘करतार सिंह के उदाहरण का अनुसरण करते हुए, भ्रामक क्या है, इसे परिभाषित नहीं किया गया है’’ और यह भी जोड़ा कि सरकार द्वारा उद्धृत किसी भी आपत्तिजनक सामग्री को मौजूदा प्रोटोकॉल के तहत पहले ही हटा दिया गया है।

पीठ ने केंद्र द्वारा अपील दायर करने में हुई 400 दिनों की देरी को माफ कर दिया और चार सप्ताह के भीतर जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया।

सूचना प्रौद्योगिकी नियमों में विवादित संशोधन केंद्र सरकार द्वारा छह अप्रैल, 2023 को सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 के तहत पेश किए गए थे।

इन नियमों के तहत केंद्र सरकार को सोशल मीडिया पर ‘‘सरकारी कामकाज’’ से संबंधित ‘‘फर्जी, झूठी या भ्रामक’’ जानकारी की पहचान करने के लिए एक तथ्य-अन्वेषण इकाई (एफसीयू) स्थापित करने का अधिकार दिया गया। इन नियमों के तहत, यदि एफसीयू किसी सामग्री को संदिग्ध पाती है, तो सोशल मीडिया मध्यस्थों (जैसे ‘एक्स’, ‘फेसबुक’ या ‘यूट्यूब’) को उसे हटाना अनिवार्य था, अन्यथा उन्हें ‘सेफ हार्बर’ की छूट खोनी पड़ सकती थी।

सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 79 के अंतर्गत सुरक्षित आश्रय (सेफ हार्बर) मध्यस्थों (आईएसपी, सोशल मीडिया, ई-कॉमर्स) को तृतीय-पक्ष सामग्री के लिए दायित्व से सुरक्षा प्रदान करता है, बशर्ते वे तटस्थ सुविधाकर्ता के रूप में कार्य करें और उचित सावधानी बरतें।

मुंबई उच्च न्यायालय ने 24 सितंबर 2024 को सरकार के खिलाफ सोशल मीडिया पर फर्जी और झूठी सामग्री की पहचान और विनियमन के उद्देश्य से संशोधित सूचना प्रौद्योगिकी नियमों को औपचारिक रूप से रद्द कर दिया।

उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति ए.एस. चंदुरकर की अध्यक्षता वाली एकल पीठ ने 20 सितंबर 2024 को फैसला सुनाया कि संशोधित नियम अस्पष्ट और व्यापक होने के कारण न केवल व्यक्ति पर बल्कि सोशल मीडिया मध्यस्थों पर भी नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं।

इससे पहले एक खंडपीठ द्वारा दिए गए विभाजित फैसले के बाद न्यायमूर्ति चंदुरकर ने निर्णायक न्यायाधीश के रूप में फैसला दिया।

न्यायमूर्ति ए.एस. गडकरी और न्यायमूर्ति नीला गोखले की खंडपीठ ने स्टैंड-अप कॉमेडियन कुणाल कामरा, एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया, न्यूज ब्रॉडकास्ट एंड डिजिटल एसोसिएशन और एसोसिएशन ऑफ इंडियन मैगजीन्स द्वारा नए नियमों को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं पर औपचारिक रूप से फैसला सुनाया।

उच्च न्यायालय ने कहा था, ‘‘बहुमत की राय को देखते हुए, नियम 3 (1) (V) को असंवैधानिक घोषित किया जाता है और इसे निरस्त किया जाता है। इसलिए याचिकाएं स्वीकार की जाती हैं।’’

भाषा सुरभि सुभाष

सुभाष