नयी दिल्ली, 27 सितंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई भुगतान पर ‘मर्चेंट डिस्काउंट रेट’ (एमडीआर यानी व्यापारी से लिया जाने वाला शुल्क) लगाने के केंद्र के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सोमवार को सुनवाई करेगा।
यूपीआई भुगतान लगभग छह वर्ष तक पूरी तरह नि:शुल्क था। सरकार ने 15 अक्टूबर से यूपीआई मंच के जरिये व्यापारियों को 2,000 रुपये से अधिक के भुगतान पर 0.4 प्रतिशत शुल्क लगाने का फैसला किया है।
हालांकि, व्यक्ति से व्यक्ति के बीच होने वाले रोजमर्रा के लेनदेन और छोटी राशि के भुगतान पर कोई शुल्क नहीं लगेगा। इसके माध्यम से 75,000 रुपये या उससे अधिक के भुगतान पर एमडीआर की अधिकतम सीमा 300 रुपये होगी।
रेलवे, दूरसंचार, बीमा, ईंधन और कृषि संबंधी सामग्री जैसे आवश्यक सेवाओं तथा कम लाभ वाले क्षेत्रों में 2,000 रुपये से अधिक के प्रत्येक लेनदेन पर पांच रुपये का निश्चित एमडीआर लगेगा।
म्यूचुअल फंड, प्रतिभूतियों तथा शेयर ब्रोकर एवं डीलरों के माध्यम से किए जाने वाले भुगतान पर 0.02 प्रतिशत एमडीआर लगेगा और इसकी अधिकतम सीमा भी 300 रुपये होगी।
व्यक्ति से व्यक्ति (पी2पी) लेनदेन पर कोई शुल्क नहीं लगेगा, भले ही राशि कितनी भी हो। पी2पी लेनदेन यूपीआई के कुल लेनदेन की संख्या का 37 प्रतिशत और कुल लेनदेन मूल्य का 70 प्रतिशत हैं।
उच्चतम न्यायालय की 28 सितंबर की वाद सूची के अनुसार, अधिवक्ता अंजन दत्ता की याचिका पर प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत तथा न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ सुनवाई करेगी।
दत्ता की ओर से दायर जनहित याचिका में केंद्र की 14 सितंबर की अधिसूचना और 15 सितंबर को घोषित उस एमडीआर व्यवस्था को चुनौती दी गई है, जो 15 अक्टूबर से प्रभावी होनी है।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि पर्याप्त वैधानिक सुरक्षा उपायों, पारदर्शिता और सार्वजनिक परामर्श के बिना यह शुल्क लगाया गया है।
याचिका में भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 की संशोधित धारा 10ए की संवैधानिक वैधता को भी चुनौती दी गई है।
इसमें कहा गया है कि यह प्रावधान बिना स्पष्ट दिशानिर्देश के कार्यपालिका को यह अधिकार देता है कि कौन सा इलेक्ट्रॉनिक भुगतान माध्यम शुल्क मुक्त रहेगा।
भाषा सिम्मी रंजन
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