वैज्ञानिक आंकड़ों से गंगा की स्वच्छता में सुधार का पता चलता है: एनएमसीजी
वैज्ञानिक आंकड़ों से गंगा की स्वच्छता में सुधार का पता चलता है: एनएमसीजी
नयी दिल्ली, 18 जून (भाषा) राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) ने बुधवार को कहा कि गंगा साफ हो रही है या नहीं, यह अब ‘‘सिर्फ राय का मामला नहीं’’ है और वैज्ञानिक निगरानी से अब नदी की स्थिति में सुधार के सबूत उपलब्ध हैं।
‘नमामि गंगे’ कार्यक्रम के 12 साल पूरे होने पर एनएमसीजी ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, ‘‘हमारे जीवन के अधिकतर समय में, ‘क्या गंगा साफ़ हो रही है’ यह राय का विषय रहा है।’’
इसने कहा, ‘‘नमामि गंगे के 12 वर्षों ने इसे बदल दिया है। आज, इसका जवाब एक माप है।’’
एनएमसीजी के अनुसार, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में पानी की गुणवत्ता की निगरानी करने वाले 112 स्टेशन संचालित हैं, जो घुलित ऑक्सीजन, जैव-रासायनिक ऑक्सीजन की मांग, पीएच और ‘फीकल कोलीफॉर्म’ को मापते हैं।
इसने कहा, ‘‘हर पैमाना हमें बताता है कि कोई नदी जीवित है या मर रही है।’’
इस मिशन में नदी प्रबंधन में प्रौद्योगिकी और डेटा के इस्तेमाल पर भी ज़ोर दिया गया तथा बताया गया कि ‘गंगा नॉलेज पोर्टल’ पर 1,380 ज्ञान संसाधन उपलब्ध हैं।
पोस्ट में कहा गया, ‘‘उनसे जो डेटा मिलता है, वह अब किसी फ़ाइल में छिपा हुआ नहीं है। ‘गंगा नॉलेज पोर्टल’ पर 1,380 ज्ञान संसाधन मौजूद हैं, जो इंटरनेट कनेक्शन वाले किसी भी व्यक्ति के लिए उपलब्ध हैं। लिडार(एलआईडीएआर) मैपिंग। उपग्रह से ली गई तस्वीरें। एआई आधारित विश्लेषण। नदी को उन्हीं उपकरणों से समझा जा रहा है जिनका इस्तेमाल हम धरती का अध्ययन करने के लिए करते हैं।’’
एनएमसीजी के अनुसार, ‘‘अब नदी की मुख्य धारा के ज़्यादातर हिस्सों में पानी की गुणवत्ता नहाने के लिए तय मानकों के अनुरूप है।’’
इसने कहा, ‘‘घुलित ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ी है और प्रदूषण का स्तर कम हुआ है। गंगा अब भी वैसी नहीं है जैसी हज़ारों साल पहले हुआ करती थी, लेकिन पहली बार ऐसा हो रहा है कि हर साल इसके मापदंड बेहतर हो रहे हैं।’’
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) गंगा के मुख्य बहाव वाले पांच राज्यों में 112 जगहों पर पानी की गुणवत्ता की निगरानी करता है। इन जगहों में उत्तराखंड में 19, उत्तर प्रदेश में 41, बिहार में 33, झारखंड में 4 और पश्चिम बंगाल में 15 स्थान शामिल हैं।
सरकार ने कहा है कि जनवरी-अगस्त 2025 के लिए पानी की गुणवत्ता के औसत आंकड़ों से पता चला है कि सभी निगरानी वाली जगहों पर पीएच और घुलित ऑक्सीजन का स्तर नहाने के लिए तय मानकों के अनुरूप था।
उत्तराखंड, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में जैव-रासायानिक ऑक्सीजन मांग का स्तर नहाने के लिए तय मानकों के अनुरूप रहा। हालाँकि, उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में ये मानक पूरे नहीं हुए।
एनएमसीजी ने अपने पोस्ट में कहा, ‘‘उत्तर प्रदेश में कानपुर तथा मिर्ज़ापुर-गाज़ीपुर के आसपास के कुछ हिस्सों में अब भी नियमों का उल्लंघन हो रहा है।’’
इसने कहा, ‘‘यही डेटा हमें यह बताता है। ईमानदार माप ही ईमानदार प्रगति का पहला रूप है।’’
केंद्र के अनुसार, गैर-अनुपालन वाले क्षेत्रों में फर्रुखाबाद से लेकर कानपुर के पुराना राजपुर, रायबरेली जिले के डलमऊ के आसपास और मिर्ज़ापुर से लेकर ग़ाज़ीपुर के ताड़ीघाट तक के प्रवाह क्षेत्र शामिल हैं।
सरकारी आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि पिछले कुछ वर्षों में नदियों की स्थिति में सुधार हुआ है। उत्तराखंड में अब गंगा की मुख्य धारा का कोई भी हिस्सा प्रदूषित नहीं है, जबकि उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों में 2018 की तुलना में प्रदूषण के स्तर में कमी आई है।
इन आंकड़ों के अनुसार, 2024-25 के दौरान की गई जैव निगरानी में गंगा और इसकी सहायक नदियों के पानी की जैविक गुणवत्ता मुख्य रूप से ‘‘अच्छी’’ से ‘‘मध्यम श्रेणी’’ की पाई गई, जो जलीय जीवन को बनाए रखने की नदी की क्षमता को दर्शाती है।
वर्ष 2014 में शुरू किया गया ‘नमामि गंगे’ कार्यक्रम, गंगा और इसकी सहायक नदियों के संरक्षण एवं पुनरुद्धार के लिए केंद्र सरकार की एक प्रमुख पहल है।
भाषा नेत्रपाल नरेश
नरेश

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