भीषण ठंड गुर्दे, फेफड़े और हृदय को कर सकती है प्रभावित: चिकित्सक
भीषण ठंड गुर्दे, फेफड़े और हृदय को कर सकती है प्रभावित: चिकित्सक
नयी दिल्ली, 12 जनवरी (भाषा) राष्ट्रीय राजधानी में भीषण शीत लहर के बीच अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के चिकित्सकों ने चेतावनी दी है कि इस तरह की अत्यधिक ठंड पुरानी बीमारियों को और जटिल बना सकती है तथा गुर्दे, फेफड़े एवं हृदय को प्रभावित कर सकती है।
सोमवार को दिल्ली में अधिकतम तापमान 20.6 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जो सामान्य से 0.7 डिग्री अधिक था, जबकि न्यूनतम तापमान 3.2 डिग्री सेल्सियस रहा, जो इस मौसम के औसत से 4.2 डिग्री कम था।
एम्स के हृदयरोग विभाग के प्रमुख डॉ. राजीव नारंग ने कहा कि अत्यधिक ठंड का मौसम व्यक्ति के रक्तचाप को सीधे प्रभावित करता है।
उन्होंने कहा, ‘‘सर्दियों के दौरान रक्त वाहिकाएं सिकुड़ जाती हैं और लोग पानी भी कम पीने लगते हैं, जिससे रक्त प्रवाह पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है और रक्तचाप बढ़ जाता है। साथ ही, इस दौरान नमकीन और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों का सेवन भी बढ़ जाता है। इन सभी कारणों से रक्तचाप बढ़ सकता है, जिससे दिल के दौरे का खतरा बढ़ जाता है।’’
डॉ. नारंग ने सर्दियों के दौरान नियमित रूप से रक्तचाप की निगरानी करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि लोगों को ठंड के मौसम में पर्याप्त मात्रा में पानी पीना चाहिए।
अत्यधिक ठंड की स्थिति का किडनी पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में बात करते हुए, एम्स के ‘नेफ्रोलॉजी (वृक्कविज्ञान)’ विभाग के प्रोफेसर डॉ. संदीप महाजन ने कहा कि अत्यधिक ठंड के दौरान रक्तचाप बढ़ने लगता है तथा चूंकि वृक्क की बीमारी से ग्रस्त (सीकेडी) कई मरीजों को पहले से ही उच्च रक्तचाप की समस्या होती है, इसलिए सर्दियों के महीनों में रक्तचाप का स्तर अक्सर अधिक रहता है।
डॉ. महाजन ने कहा कि मरीजों को योग जैसी घरेलू गतिविधियों के माध्यम से नियमित शारीरिक गतिविधि बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, क्योंकि यह रक्तचाप और रक्त शर्करा दोनों को नियंत्रित करने के लिए महत्वपूर्ण है, खासकर जब ठंड के मौसम के कारण बाहरी गतिविधियां सीमित हों।
एम्स के चिकित्सा विभाग के प्रोफेसर डॉ. संजीव सिन्हा ने फेफड़ों पर ठंड के प्रभावों के बारे में बताया।
उन्होंने कहा, “ठंडी हवा के संपर्क में आने से वायुमार्ग सिकुड़ जाते हैं और ब्रोंकोस्पाज्म हो जाता है, जिससे ब्रोंकियल अस्थमा और क्रॉनिक ऑब्स्ट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) के मरीजों की स्थिति बिगड़ सकती है। बुजुर्गों में इससे निमोनिया भी हो सकता है।”
भाषा राजकुमार संतोष
संतोष

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