अंत:करण या मान्यताओं के कारण वंदे मातरम् न गाने के लिए दंडित नहीं किया जाना चाहिए: न्यायालय

अंत:करण या मान्यताओं के कारण वंदे मातरम् न गाने के लिए दंडित नहीं किया जाना चाहिए: न्यायालय

अंत:करण या मान्यताओं के कारण वंदे मातरम् न गाने के लिए दंडित नहीं किया जाना चाहिए: न्यायालय
Modified Date: September 22, 2026 / 07:17 pm IST
Published Date: September 22, 2026 7:17 pm IST

नयी दिल्ली, 22 सितंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को केंद्र से कहा कि ‘‘अंतरात्मा या अपनी मान्यताओं’’ के कारण किसी व्यक्ति को वंदे मातरम् गाने से इनकार करने पर दंडित नहीं किया जाना चाहिए, और सरकार को 1986 के उस निर्णय को ध्यान में रखने को कहा, जिसमें अपने अंत:करण के कारण राष्ट्रगान गाने से इनकार करने वाले बच्चों को संरक्षण दिया गया था।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, कर्नाटक संगीत गायक टी.एम. कृष्णा की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें वंदे मातरम् के सभी छह अंतरा के गायन को अनिवार्य बनाने वाले कानून को चुनौती दी गई है। याचिका में दलील दी गई है कि आखिरी चार अंतरा देश के पंथनिरपेक्ष स्वरूप का उल्लंघन करते हैं।

याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगते हुए, पीठ ने कहा कि उसे उम्मीद है कि संशोधित कानून पर उच्चतम न्यायालय के 1986 के ‘बिजॉय इमैनुएल बनाम केरल राज्य’ मामले में तय किए गए सिद्धांत लागू होंगे।

पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल हैं।

उस मामले में, न्यायालय ने उन स्कूली बच्चों को संरक्षण दिया था, जिन्होंने अपने अंत:करण के कारण राष्ट्र गान गाने से सम्मानपूर्वक इनकार कर दिया था।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को संबोधित करते हुए न्यायमूर्ति बागची ने मौखिक रूप से कहा, ‘‘… हम नोटिस जारी करने को इच्छुक नहीं हैं। लेकिन हमें उम्मीद है कि ‘बिजॉय इमैनुएल’ मामले में इस न्यायालय द्वारा तय किया गया देश का कानून ही (संशोधित) अधिनियम पर लागू होगा।’’

न्यायमूर्ति बागची ने कहा, ‘‘राष्ट्र गीत क्या है, इस पर कोई विवाद नहीं है। ‘बिजॉय इमैनुएल’ मामले में स्थापित कानूनी सिद्धांत पर अभी तक कोई सवाल नहीं उठाया गया है। यह तय करना लोकतांत्रिक राज्य (सरकार) का काम है कि राष्ट्र गीत क्या होगा — दो अंतरा या चार अंतरा। लेकिन अगर किसी को लगता है कि अनुच्छेद 25 और 26 (धर्म की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार) के तहत उसके अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है, या कोई व्यक्ति अपने अंत:करण के कारण इसका विरोध करता है, तो उसे (दंडनीय कार्रवाई) का सामना नहीं करना पड़ेगा।’’

कृष्णा की याचिका में राष्ट्रीय गौरव के अपमान निवारण अधिनियम, 1971 (जिसमें 2026 में संशोधन किया गया) की धारा 3, और साथ ही गृह मंत्रालय के 28 जनवरी और नौ जुलाई 2026 के आदेश को चुनौती दी गई है।

संशोधित धारा 3 के तहत, जो कोई भी राष्ट्र गान या राष्ट्र गीत के गायन में इरादतन बाधा डालता है, या ऐसे गायन के लिए एकत्र सभा में व्यवधान डालता है, उसे तीन साल तक की जेल, या जुर्माना, या दोनों हो सकते हैं।

न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि वंदे मातरम् से संबंधित राष्ट्रीय भावनाएं या आकांक्षाओं से जुड़े मामले में राय बनाना अदालत का काम नहीं है। उन्होंने कहा कि यह तय करना सरकार का काम है।

पीठ ने यह भी कहा कि राष्ट्र गीत क्या है, यह तय करना अदालत का काम नहीं है। न्यायालय ने कहा कि वह इस बात की पड़ताल करेगा कि अंत:करण या मान्यताओं के कारण इनकार करने वालों के अधिकार, विशेष रूप से वे लोग जो धार्मिक कारणों से इसे गाने से इनकार करते हैं, क्या उन्हें कानून के तहत संरक्षण प्राप्त है।

न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि शीर्ष अदालत इस बात की पड़ताल नहीं कर रही है कि राष्ट्र गीत क्या होना चाहिए।

कृष्णा की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता एस. मुरलीधर ने कहा कि संशोधन में ‘‘राष्ट्र गीत’’ शब्द को परिभाषित नहीं किया गया है, जिससे अनिश्चितता और इसके संभावित दुरुपयोग की गुंजाइश बनी हुई है। उन्होंने कहा कि यह संशोधन बिना यह बताए लागू किया गया कि राष्ट्र गीत में कौन सा संस्करण या कौन से अंतरा शामिल हैं।

उन्होंने कहा कि गृह मंत्रालय के निर्देश एक कार्यालय ज्ञापन के जरिए जारी किए गए थे, जिसे राजपत्र में प्रकाशित नहीं किया गया था। उन्होंने यह भी दलील दी कि सरकार ने शासकीय निर्देशों के जरिए वंदे मातरम् को लेकर पहले से स्थापित समझ को बदल दिया है।

न्यायमूर्ति बागची ने जब कहा कि वंदे मातरम् को आम तौर पर राष्ट्र गीत माना जाता है, तो मुरलीधर ने कहा कि यह स्थापित समझ इसके शुरुआती दो अंतरा से जुड़ी हुई है।

वरिष्ठ अधिवक्ता ने यह भी कहा कि यह संशोधन जल्दबाजी में और बिना किसी राष्ट्रीय सहमति की प्रक्रिया के लागू किया गया।

सॉलिसिटर जनरल ने भी पीठ से अपील की कि वह याचिका पर नोटिस जारी न करे, क्योंकि ऐसा करने से यह मुद्दा ‘‘सनसनीखेज’’ बन सकता है।

कृष्णा की याचिका के अनुसार, राष्ट्र गीत के संबंध में दंडात्मक प्रावधान लागू करने और वंदे मातरम् के सभी छह अंतरा के गायन के निर्देशों से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, अंत:करण की स्वतंत्रता, समानता, धार्मिक स्वतंत्रता और पंथनिरपेक्षता से जुड़े बुनियादी सवाल उठते हैं।

सुनवाई के दौरान मुरलीधर और सॉलिसिटर जनरल के बीच तीखी बहस हुई।

मेहता ने याचिकाकर्ता की दलीलों का विरोध किया और कहा कि ‘‘पंथनिरपेक्षता इतनी संकीर्ण नहीं हो सकती।’’ एक अन्य मौके पर उन्होंने कहा कि ‘‘कानून नक्सलियों की सोच के आधार पर नहीं बनाए जा सकते।’’

मुरलीधर ने मेहता द्वारा ‘‘नक्सलियों’’ शब्द का इस्तेमाल किये जाने पर कड़ी आपत्ति जताई और इसे तुरंत वापस लेने की मांग की।

मेहता ने कहा कि उनका इशारा उन लोगों की ओर था जो उनके अनुसार, कानून बनाने की प्रक्रिया का सम्मान नहीं करते। सुनवाई के बाद, मुरलीधर ने उनसे अपने शब्द वापस लेने के लिए फिर से कहा, लेकिन सॉलिसिटर जनरल ने टिप्पणी वापस लेने से इनकार कर दिया।

सॉलिसिटर जनरल ने कहा, ‘‘मैं अपनी बात दोहरा सकता हूं। कानून का पालन करना ही होता है। मैंने जो कहा, उसके लिए मुझे कोई अफसोस नहीं है। मैंने कहा कि यही संवैधानिक तरीका है, न कि वह जो नक्सली चाहते हैं। और मुझे इस बात का कोई अफसोस नहीं है।’’

बाद में, मुरलीधर ने सॉलिसिटर जनरल पर ‘‘लोगों को खुश करने के लिए दिखावा करने’’ का आरोप लगाया।

पीठ ने हस्तक्षेप नहीं किया, लेकिन कहा कि वह इन टिप्पणियों पर गौर नहीं कर रही है।

भाषा सुभाष दिलीप

दिलीप


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