नयी दिल्ली, 29 सितंबर (भाषा) दिल्ली पुलिस ने अगस्त में ग्रेटर नोएडा से दिल्ली की यात्रा के दौरान एक नाबालिग से कथित तौर पर सामूहिक दुष्कर्म करने के मामले में स्लीपर बस के चालक और परिचालक के खिलाफ 398 पन्नों का आरोपपत्र दाखिल किया है।
अधिकारियों ने बताया कि वाहन से एकत्र किए गए जैविक साक्ष्य इस मामले का एक प्रमुख हिस्सा हैं।
पुलिस ने बताया कि यह आरोपपत्र 18 सितंबर को दिल्ली की एक अदालत में दाखिल किया गया और अदालत ने 24 सितंबर को इस पर संज्ञान लिया।
घटना चार अगस्त की रात को हुई जब उत्तर प्रदेश की रहने वाली नाबालिग यह समझकर ग्रेटर नोएडा में बस में सवार हुई कि यह नोएडा सेक्टर 63 की तरफ जा रही थी। पुलिस के अनुसार, बस में सवार होने के बाद नाबालिग को अहसास हुआ कि गाड़ी में कोई अन्य यात्री नहीं है और उसने उतरने का प्रयास किया। हालांकि, परिचालक ने कथित तौर पर उसे गाड़ी से उतरने से रोक दिया और दरवाजा बंद कर दिया।
इसके बाद बस दिल्ली की ओर बढ़ी और नाबालिग से बस के अंदर कथित रूप से दुष्कर्म किया गया और फिर उसे कश्मीरी गेट बस टर्मिनल के पास बस से उतार दिया गया जहां उसने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।
पुलिस ने बताया कि त्वरित कार्रवाई करते हुए उसने बस का पता लगाया और बस चालक और परिचालक को गिरफ्तार कर लिया।
पुलिस की कई टीम ने सीसीटीवी फुटेज की जांच की और कुछ ही घंटों के भीतर तिमारपुर के एक पार्किंग क्षेत्र में बस का पता लगा लिया, जिसके बाद कानपुर निवासी चालक कुलदीप और परिचालक संदीप को गिरफ्तार कर लिया गया।
आरोपपत्र में 10 पुलिसकर्मियों, डॉक्टरों और अन्य लोगों को गवाह बनाया गया है। बस की फॉरेंसिक जांच के दौरान, जांचकर्ताओं ने जैविक साक्ष्य बरामद किए, जिन्हें जांच के लिए फॉरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला भेजा गया था।
जांच में बस से जुड़ी कई सुरक्षा और नियामक खामियां भी सामने आईं।
इस घटना ने 2012 के निर्भया कांड की यादें ताजा कर दीं, जब 23 वर्षीय फिजियोथेरेपी इंटर्न के साथ एक बस में सामूहिक दुष्कर्म किया गया था और बाद में उसे सड़क पर फेंक दिया गया था।
उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को स्लीपर बस की घटना और दिल्ली-एनसीआर में नाबालिग लड़कियों तथा महिलाओं के खिलाफ अन्य अपराधों से जुड़ी खबरों पर स्वत: संज्ञान लिया और टिप्पणी की कि ऐसे मामले कानून प्रवर्तन अधिकारियों की ओर से व्यवस्थागत विफलता को रेखांकित करते हैं।
न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि इन घटनाओं की तुलना 2012 के निर्भया मामले से करना स्वाभाविक है। पीठ ने यह सवाल उठाया कि क्या उसके बाद के दशक में कानून-व्यवस्था से जुड़ी व्यवस्थाओं में कोई ठोस सुधार हुआ है।
भाषा नोमान आशीष
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