कुछ राज्यों ने विशेष एनआईए अदालतें स्थापित करने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए : न्यायालय
कुछ राज्यों ने विशेष एनआईए अदालतें स्थापित करने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए : न्यायालय
नयी दिल्ली, 20 जुलाई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को इस बात पर नाखुशी जाहिर की कि कुछ राज्यों ने गंभीर अपराधों की सुनवाई के लिए राष्ट्रीय अभिकरण (एनआईए) की विशेष अदालतें स्थापित करने की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए हैं।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी मोहना की पीठ ने कहा कि न्यायिक बुनियादी ढांचे को लेकर प्रगति के आधिकारिक दावों के बावजूद “जमीनी हकीकत” निराशाजनक बनी हुई है।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, “हमने पाया है कि कुछ राज्यों में विशेष एनआईए अदालतों की स्थापना के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में सिर्फ एक अदालत की स्थापना ऐसे लंबित मामलों के बोझ से निपटने के लिए काफी नहीं है।”
शीर्ष अदालत ने विशेष और विशिष्ट अदालतों की स्थापना से जुड़ा यह स्वत: संज्ञान मामला तब शुरू किया था, जब उसने पाया कि एनआईए से जुड़े मुकदमे, जिनमें अक्सर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत आरोप शामिल होते हैं, वर्षों से लंबित पड़े हैं, जिससे आरोपियों और पीड़ितों, दोनों के अधिकार प्रभावित हो रहे हैं।
केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने पीठ को बताया कि इस दिशा में उल्लेखनीय प्रगति हुई है और अब तक 14 विशेष समर्पित एनआईए अदालतें स्थापित की जा चुकी हैं।
उन्होंने कहा कि झारखंड में एनआईए के 27 मामले लंबित हैं और वहां सात नामित अदालतें मौजूद हैं।
भाटी ने बताया कि जम्मू-कश्मीर, बिहार, छत्तीसगढ़, मणिपुर, असम और मिजोरम में एक-एक, जबकि गुजरात में तीन नामित अदालतें हैं।
हालांकि, प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि केवल अदालतों को नामित कर देना पर्याप्त नहीं है। उन्होंने कहा, “सबसे बड़ी समस्या यही है कि अदालतों को सिर्फ “नामित” कर दिया जाता है।”
भाटी ने कहा कि अतिरिक्त अदालतों की स्थापना के लिए मंजूरी 16 जुलाई को मिल गई थी और अब बस सरकार की तरफ से औपचारिक अधिसूचना जारी किया जाना बाकी है।
पीठ ने पंजाब और हरियाणा की स्थिति की भी समीक्षा की।
प्रधान न्यायाधीश ने वस्तुस्थिति रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि पंजाब और हरियाणा में एनआईए के कुल 32 मामले लंबित हैं, लेकिन दोनों राज्यों सुनवाई के लिए केवल एक ही नामित अदालत है।
हरियाणा सरकार की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि राज्य ने स्वापक औषधि एवं मन:प्रभावी पदार्थ (एनडीपीएस) अधिनियम के तहत दर्ज मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतें तो स्थापित की हैं, जबकि एनआईए मामलों के लिए 23 जून को एक अदालत को अधिसूचित किया गया था।
भाटी ने पीठ को भरोसा दिलाया कि इस दिशा में उचित कदम उठाए जाएंगे।
पीठ ने मामले की सुनवाई 20 जुलाई के लिए निर्धारित कर दी।
शीर्ष अदालत ने आठ मई को निर्देश दिया था कि उन मामलों में लंबित 10 से 15 मुकदमों की त्वरित सुनवाई के लिए कम से कम एक विशेष अदालत स्थापित की जाए, जिनकी एनआईए कर रही है।
न्यायालय ने ऐसे मुकदमों की सुनवाई में तेजी लाने के लिए कई निर्देश जारी किए थे, जिनमें एनआईए के माध्यम से केंद्र सरकार अभियोजक है। उसने स्पष्ट किया था कि विशेष अदालतों की स्थापना एक महीने के भीतर की जानी चाहिए।
न्यायालय ने केंद्र को संबंधित उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश से संपर्क करने और एनआईए अधिनियम-2008 की धारा-11 के तहत विशेष अदालतों की स्थापना के लिए परामर्श करने का निर्देश दिया।
एनआईए अधिनियम की धारा-11 विशेष अदालतों की स्थापना करने की केंद्र सरकार की शक्तियों से संबंधित है।
न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि विशेष अदालतों को एनआईए मामलों के अलावा कोई अन्य मामले नहीं सौंपे जाएंगे और सुनवाई दैनिक आधार पर की जाएगी।
उसने कहा था कि विशेष अदालत के न्यायाधीशों को यह सुनिश्चित करते हुए मामलों को अपनी इच्छानुसार सूचीबद्ध करने की छूट होगी कि कम से कम एक मुकदमे की सुनवाई एक महीने के भीतर पूरी हो जाए।
शीर्ष अदालत ने कहा था, “यह स्पष्ट किया जाता है कि 10 से 15 लंबित मुकदमों के लिए कम से कम एक विशेष अदालत होगी।”
उसने कहा था कि अगर लंबित मुकदमों की संख्या 15 से अधिक है, तो दो विशेष अदालतें स्थापित की जाएंगी।
न्यायालय ने राज्यों को अपने पिछले आदेश पर अमल करने का निर्देश दिया था, जिसमें कहा गया था कि उनके लिए विशेष अदालतों की स्थापना के लिए जरूरी कक्ष और अन्य बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराना आवश्यक होगा।
सर्वोच्च अदालत ने एनआईए अधिनियम की धारा-22 के तहत दर्ज मामलों से जुड़े मुकदमों के मुद्दे पर भी विचार किया था, जिनमें राज्य अभियोजक होता है।
एनआईए अधिनियम की धारा-22 राज्य सरकार को विशेष अदालत स्थापित करने की शक्ति प्रदान करती है।
शीर्ष अदालत ने राज्यों के महाधिवक्ताओं से उच्च न्यायालयों के रजिस्ट्रार जनरल के परामर्श से अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में लंबित मुकदमों का विवरण पेश करने को कहा।
भाषा पारुल नरेश
नरेश

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