नयी दिल्ली, 11 अगस्त (भाषा) शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने मंगलवार को उच्चतम न्यायालय में कहा कि किसी विधानमंडल दल में विभाजन होने मात्र से राजनीतिक दल में विभाजन नहीं माना जा सकता। पार्टी ने दलील दी कि निर्वाचन आयोग द्वारा एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट को ‘असली शिवसेना’ के रूप में मान्यता देना और उसे धनुष-बाण चुनाव चिह्न आवंटित करना अवैध था।
ये दलीलें शिवसेना (उबाठा) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के समक्ष अंतिम सुनवाई के तीसरे दिन पेश कीं।
पीठ 2024 में उद्धव ठाकरे गुट द्वारा दायर दो याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है, जिनमें निर्वाचन आयोग के उस आदेश को चुनौती दी गई है जिसके तहत महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट को धनुष-बाण चुनाव चिह्न आवंटित किया गया था।
याचिकाओं में आयोग के 17 फरवरी 2023 के उस आदेश को भी चुनौती दी गई है जिसमें शिंदे गुट को मूल शिवसेना के रूप में मान्यता दी गई थी।
निर्वाचन आयोग के फैसले का विरोध करते हुए सिब्बल ने कहा, ‘‘यह मान लेना कि विधानमंडल दल में विभाजन का अर्थ राजनीतिक दल में विभाजन है, कानून के विपरीत है और इसे रद्द किया जाना चाहिए।’’
उन्होंने संविधान की दसवीं अनुसूची के एक पूर्व प्रावधान का उल्लेख करते हुए कहा कि उसमें भी यही शर्त थी कि विभाजन मूल राजनीतिक दल में होना चाहिए। उसके बाद ही विधायकों का एक-तिहाई समूह अलग समूह बना सकता था।
सिब्बल ने कहा कि इस मुद्दे पर पहले भी न्यायालय विचार कर चुका है। न्यायालय ने यह तर्क खारिज कर दिया था कि विधायक दो भूमिकाओं में होते हैं -एक मूल राजनीतिक दल के सदस्य के रूप में और दूसरी विधानमंडल दल के सदस्य के रूप में और यदि एक-तिहाई विधायक अलग समूह बना लें तो इससे स्वतः मूल राजनीतिक दल में विभाजन मान लिया जाए।
उन्होंने कहा कि चुनाव चिह्न आदेश के तहत केवल विधानमंडल दल में विभाजन के आधार पर अधिकार क्षेत्र ग्रहण करना अवैध है।
सिब्बल ने कहा, ‘‘यदि मेरी यह दलील सही है, तो निर्वाचन आयोग द्वारा अधिकार क्षेत्र ग्रहण करना ही गलत था और उसके बाद की सारी कार्यवाही अवैध हो जाती है।’’
उन्होंने कहा कि आयोग ने मुख्य रूप से दोनों गुटों की अलग-अलग बैठकों, अलग विधानमंडल दल नेताओं और मुख्य सचेतकों की नियुक्ति तथा विधायकों के खिलाफ अयोग्यता की कार्यवाही से संबंधित पत्राचार पर भरोसा किया।
सिब्बल ने कहा, ‘‘आयोग ने इन दस्तावेजों को शिवसेना के भीतर प्रतिद्वंद्वी समूह के उभरने का प्रमाण माना, जबकि ये सामग्री मूलतः विधानमंडल दल से संबंधित थी और इससे राजनीतिक दल में विभाजन सिद्ध नहीं होता।’’
सिब्बल ने शिवसेना के 2018 के संविधान को अलोकतांत्रिक बताकर नजरअंदाज करने के निर्वाचन आयोग के फैसले को भी चुनौती दी। उन्होंने कहा कि शिंदे गुट के सदस्य स्वयं इसी संविधान के तहत पद और लाभ प्राप्त कर चुके थे और बाद में उसी संविधान को चुनौती नहीं दे सकते।
सिब्बल ने कहा कि यदि यह मान भी लिया जाए कि 2018 का संविधान अलोकतांत्रिक था, तब भी इससे पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न प्रतिद्वंद्वी गुट को सौंपने का अधिकार नहीं मिल जाता।
उन्होंने कहा कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29ए के तहत निर्वाचन आयोग के पास यह अधिकार नहीं है कि वह पहले से पंजीकृत किसी राजनीतिक दल के आंतरिक संविधान को लोकतांत्रिक या अलोकतांत्रिक घोषित करे।
सिब्बल ने कहा कि धारा 29ए मुख्य रूप से राजनीतिक दलों के पंजीकरण से संबंधित है और इसमें उनसे संविधान तथा समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र के सिद्धांतों के प्रति निष्ठा की घोषणा करने की अपेक्षा की गई है। यह प्रावधान आयोग को बाद में किसी पार्टी के संविधान को अलोकतांत्रिक बताकर अमान्य करने का अधिकार नहीं देता।
बहरहाल, न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि अनुच्छेद 19(4) में प्रयुक्त ‘लोक व्यवस्था’ और ‘नैतिकता’ जैसे शब्द व्यापक और लचीले हैं। इस पर सिब्बल ने कहा कि वह केवल संवैधानिक मुद्दे की ओर ध्यान आकर्षित कर रहे हैं, जबकि न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि नैतिकता की अवधारणा में संवैधानिक नैतिकता का प्रश्न भी शामिल हो सकता है।
ठाकरे गुट का लगातार यह कहना रहा है कि निर्वाचन आयोग ने यह तय करते समय कि शिवसेना का प्रतिनिधित्व कौन-सा गुट करता है, संगठनात्मक समर्थन के बजाय विधानमंडल दल की संख्या को प्राथमिकता देकर गलती की।
मामले की सुनवाई बुधवार को भी जारी रहेगी।
भाषा गोला नरेश
नरेश