जेलों में बंद लोगों के बच्चों की देखभाल के लिए मानक संचालन प्रक्रिया का प्रस्ताव
जेलों में बंद लोगों के बच्चों की देखभाल के लिए मानक संचालन प्रक्रिया का प्रस्ताव
नयी दिल्ली, नौ सितंबर (भाषा) राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने जेलों में बंद माता-पिता के बच्चों की देखभाल और उनके संरक्षण के लिए विस्तृत मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) का प्रस्ताव रखा है। इसमें जेल परिसरों में आंगनवाड़ी या गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) द्वारा संचालित शिशु गृह स्थापित करने और बच्चों की माता-पिता से नियमित मुलाकात की व्यवस्था करने का सुझाव दिया गया है।
एनसीपीसीआर द्वारा तैयार ‘जेल में बंद माता-पिता के बच्चों की देखभाल और संरक्षण’ विषयक मसौदा एसओपी में उन बच्चों के लिए भी प्रक्रियाएं तय की गई हैं, जो अपनी मां के साथ जेल में रहते हैं और उन बच्चों के लिए भी जो जेल के बाहर अभिभावकों, रिश्तेदारों या बाल देखभाल संस्थानों में रह रहे हैं।
एनसीपीसीआर ने कहा कि जेल में बंद माता-पिता के बच्चे भारत में बाल संरक्षण व्यवस्था के सबसे अधिक उपेक्षित और कम ध्यान दिए जाने वाले समूहों में शामिल हैं।
आयोग ने कहा कि देशभर में माता-पिता के जेल जाने से अनुमानित आठ लाख बच्चे प्रभावित होते हैं, लेकिन अपनी मां के साथ जेलों में रहने वाले इनमें से केवल कुछ ही बच्चे आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज हो पाते हैं।
एनसीपीसीआर के अनुसार, वर्ष 2024 तक 1,397 बच्चे जेलों में रह रहे थे। इनमें से कई बच्चे भीड़भाड़ वाले और अस्वच्छ वातावरण में रहते हैं, जहां उन्हें पोषण, स्वास्थ्य देखभाल और मनोरंजन जैसी सुविधाओं का सीमित लाभ मिल पाता है।
मसौदा एसओपी में कहा गया है कि जिन जेलों में बच्चे अपनी माताओं के साथ रह रहे हैं, वहां मिशन सक्षम आंगनवाड़ी और पोषण 2.0 के तहत आंगनवाड़ी केंद्र या एनजीओ द्वारा संचालित शिशु गृह होना चाहिए, ताकि ऐसे बच्चों के लिए ‘सामान्य वातावरण’ तैयार किया जा सके।
आयोग ने सुझाव दिया है कि आंगनवाड़ी या शिशु गृह जेल भवन से बाहर लेकिन संभव हो तो जेल परिसर के भीतर स्थापित किया जाना चाहिए।
मसौदे में कहा गया है कि शिशु गृह में बच्चों के स्वतंत्र रूप से घूमने और खेलने के लिए पर्याप्त स्थान होना चाहिए। वहां उम्र के अनुसार खिलौने और खेल सामग्री उपलब्ध होनी चाहिए। साथ ही जेलों में रह रहे शून्य से छह वर्ष तक के बच्चों को उम्र के अनुरूप शिक्षा, मनोरंजन और आहार उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
मसौदे के अनुसार, छह वर्ष की आयु पूरी करने के बाद बच्चे को मां की सहमति से किसी अभिभावक के साथ रखा जा सकता है। इसके लिए मां या किसी अन्य सक्षम प्राधिकारी को जेल अधीक्षक के पास आवेदन करना होगा।
इसमें कहा गया है कि यदि ऐसा विकल्प उपलब्ध नहीं है या मां उपलब्ध अभिभावक के साथ बच्चे को रखने की सहमति नहीं देती है, तो बच्चे को पुनर्वास के लिए निकटतम बाल कल्याण समिति (सीडब्ल्यूसी) के समक्ष पेश किया जाना चाहिए।
एनसीपीसीआर ने जेल में बंद माताओं और बच्चों के बीच संबंध बनाए रखने पर भी जोर दिया है। इसके तहत बाल कल्याण समिति, संबंधित बाल देखभाल संस्था और जेल अधीक्षक को बच्चे तथा जेल में बंद मां के बीच सप्ताह में कम से कम एक बार या मां के अनुरोध पर नियमित मुलाकात और संवाद की व्यवस्था करनी होगी। जहां आमने-सामने मुलाकात संभव नहीं हो, वहां वीडियो कॉल, वीडियो कॉन्फ्रेंस या टेलीफोन के माध्यम से बातचीत की सुविधा उपलब्ध कराने का सुझाव दिया गया है।
जेल से बाहर रहने वाले बच्चों के संबंध में मसौदे में प्रस्ताव दिया गया है कि गिरफ्तारी के समय पुलिस अधिकारी गिरफ्तारी संबंधी दस्तावेज में आश्रित बच्चों का विवरण दर्ज करें।
मसौदा एसओपी में जेल में बंद माता-पिता के बच्चों की शिक्षा जारी रखने के लिए आवश्यक सहायता उपलब्ध कराने की भी बात कही गई है। साथ ही माता-पिता के किसी अन्य जेल में स्थानांतरण की जानकारी बच्चों को देने का सुझाव दिया गया है।
एनसीपीसीआर ने मसौदे पर नौ अक्टूबर तक सुझाव आमंत्रित किए हैं, जिन पर विचार करने के बाद एसओपी को अंतिम रूप दिया जाएगा।
भाषा रवि कांत रवि कांत अविनाश
अविनाश

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