उच्चतम न्यायालय की पीठ ने महिलाओं से धार्मिक भेदभाव से जुड़ी याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित किया

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उच्चतम न्यायालय की पीठ ने महिलाओं से धार्मिक भेदभाव से जुड़ी याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित किया

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  • Publish Date - May 14, 2026 / 05:37 PM IST,
    Updated On - May 14, 2026 / 05:37 PM IST

नयी दिल्ली, 14 मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय के नौ न्यायाधीशों की पीठ ने केरल के शबरिमला मंदिर सहित धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव और विभिन्न धर्मों में धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे और सीमा से संबंधित याचिकाओं पर अपना फैसला बृहस्पतिवार को सुरक्षित रख लिया।

भारत के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने 16 दिनों तक इस मामले की सुनवाई की और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता, वरिष्ठ अधिवक्ता सी एस वैद्यनाथन, अभिषेक सिंघवी, मुकुल रोहतगी, इंदिरा जयसिंह, नीरज किशन कौल और गोपाल शंकरनारायणन सहित कई वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने विभिन्न पक्षकारों की ओर से दलीलें पेश की।

इस संविधान पीठ में न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना, न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश, न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी वराले, न्यायमूर्ति आर महादेवन और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची शामिल हैं।

सुनवाई से पहले, केंद्र ने लिखित दलीलें दाखिल कर शीर्ष अदालत से शबरिमला मंदिर में रजस्वला आयु वाली महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध को बरकरार रखने का अनुरोध किया था।

भारत सरकार ने दलील दी कि यह मुद्दा पूरी तरह से धार्मिक आस्था और संप्रदायगत स्वायत्तता के दायरे में आता है और न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर है।

सितंबर 2018 में, पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के शबरिमला स्थित अय्यप्पा मंदिर में प्रवेश पर लगी रोक को हटा दिया था और इस सदियों पुरानी धार्मिक प्रथा को अवैध और असंवैधानिक करार दिया था।

बाद में, 14 नवंबर, 2019 को, तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच-न्यायाधीशों की एक अन्य पीठ ने 3:2 के बहुमत से, विभिन्न पूजा स्थलों पर महिलाओं से भेदभाव के मुद्दे को विस्तृत सुनवाई के लिए बड़ी पीठ के पास भेज दिया।

पीठ ने तब धर्मों में स्वतंत्रता से संबंधित व्यापक मुद्दों को परिभाषित करते हुए कहा था कि विशिष्ट मामले के तथ्यों के बिना इन मुद्दों पर निर्णय नहीं लिया जा सकता है।

शबरिमला मामले के अलावा, पीठ के पास मुस्लिम महिलाओं के मस्जिदों और दरगाहों में प्रवेश और गैर-पारसी पुरुषों से विवाहित पारसी महिलाओं के अगियारी के पवित्र अग्नि स्थल में प्रवेश के मुद्दों को भी विचार के लिए भेजा गया था।

उच्चतम न्यायालय की एक अन्य पीठ ने 11 मई, 2020 को माना कि शबरिमला मंदिर प्रवेश मामले में समीक्षा क्षेत्राधिकार के तहत अपनी सीमित शक्ति का प्रयोग करते हुए, उसकी पांच-न्यायाधीशों की पीठ के पास विधि के प्रश्नों को निर्णय के लिए एक बड़ी पीठ को संदर्भित करने की शक्ति थी।

उच्चतम न्यायालय ने 16 फरवरी को कहा था कि वह इस मामले की अंतिम सुनवाई सात अप्रैल से शुरू करेगा, जिसके 22 अप्रैल को समाप्त होने की उम्मीद थी।

केंद्र सरकार का पक्ष रखने के लिए पेश हुए सॉलिसिटर जनरल मेहता ने कहा था कि वह शबरिमला फैसले की समीक्षा की याचिकाओं का समर्थन करते हैं, जिसने केरल में पहाड़ी पर स्थित इस मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दी थी।

इससे पहले, उच्चतम न्यायालय ने धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे को लेकर सात प्रश्न तैयार किये जिनपर सुनवाई की जानी थी।

पीठ ने निर्धारित मुद्दों को जोड़ने और हटाने का अधिकार होने का हवाला देते हुए कहा कि वह इस बात पर विचार करेगी कि ‘‘भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार का दायरा और सीमा क्या है?’’

पीठ ने सुनवाई के लिए दूसरा मुद्दा यह तय किया, ‘‘ भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत व्यक्तियों के अधिकारों और अनुच्छेद 26 के तहत धार्मिक संप्रदायों के अधिकारों के बीच क्या परस्पर संबंध है?’’

तीसरा प्रश्न यह है कि क्या अनुच्छेद 26 के तहत किसी धार्मिक संप्रदाय के अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अलावा अन्य मौलिक अधिकारों के अधीन हैं।

चौथा प्रश्न यह तय किया गया कि संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के अंतर्गत ‘नैतिकता’ शब्द का दायरा और विस्तार क्या है, और क्या इसमें संवैधानिक नैतिकता शामिल है?

पीठ ने कहा था कि पांचवे सवाल के तहत वह अनुच्छेद 25 के तहत संदर्भित धार्मिक प्रथा के संबंध में ‘‘न्यायिक समीक्षा के दायरे और सीमा’’ पर भी विचार करेगी।

छठा सवाल यह तय किया गया कि ‘‘भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 (2) (ख) में प्रयुक्त ‘‘हिंदुओं के वर्ग’’ की अभिव्यक्ति का क्या अर्थ है?’’

न्यायालय ने कहा था कि वह सातवें प्रश्न के रूप में इस बात की जांच करेगा कि क्या कोई व्यक्ति जो किसी धार्मिक संप्रदाय या धार्मिक समूह से संबंधित नहीं है, जनहित याचिका दायर करके उस ‘‘धार्मिक संप्रदाय या धार्मिक समूह’’ की किसी प्रथा पर सवाल उठा सकता है?

इसमें कहा गया था कि बड़ी पीठ को धार्मिक स्वतंत्रता के मामलों में ‘‘पर्याप्त और पूर्ण न्याय’’ करने के लिए एक न्यायिक नीति विकसित करनी होगी।

भाषा धीरज मनीषा

मनीषा