फांसी के जरिये मृत्युदंड देने की व्यवस्था खत्म करने के अनुरोध वाली याचिका न्यायालय ने की खारिज

फांसी के जरिये मृत्युदंड देने की व्यवस्था खत्म करने के अनुरोध वाली याचिका न्यायालय ने की खारिज

फांसी के जरिये मृत्युदंड देने की व्यवस्था खत्म करने के अनुरोध वाली याचिका न्यायालय ने की खारिज
Modified Date: August 18, 2026 / 07:31 pm IST
Published Date: August 18, 2026 7:31 pm IST

नयी दिल्ली, 18 अगस्त (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें मृत्युदंड के मामलों में दोषी को फांसी पर लटकाकर मौत देने की मौजूदा व्यवस्था को समाप्त करने और उसकी जगह घातक इंजेक्शन देने जैसे कम पीड़ादायक तरीकों को अपनाने का अनुरोध किया गया था।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि उसके समक्ष प्रस्तुत की गई सामग्री से यह स्थापित नहीं होता कि मृत्युदंड देने के लिए फांसी के बजाय घातक इंजेक्शन का विकल्प अपनाने का कोई अतिरिक्त फायदा है।

पीठ ने कहा कि वह इस बात से सहमत नहीं है कि सीआरपीसी की धारा 354(5) की संवैधानिक वैधता पर फिर से विचार करने के लिए तीन न्यायाधीशों की पीठ के 1983 के फैसले को बड़ी पीठ के पास भेजने का कोई मामला बनता है।

पीठ ने कहा, ‘‘हम यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि इस रिट याचिका को खारिज करने का मतलब यह नहीं है कि भविष्य में संवैधानिक समीक्षा नहीं हो सकती। अगर कोई ठोस वैज्ञानिक, मेडिकल या अनुभव-आधारित सबूत सामने आते हैं जो यह दर्शाते हैं कि ‘दीना’ मामले (1983 का फैसला) में जिस तथ्यात्मक और वैज्ञानिक आधार पर फैसला लिया गया था, वह बाद की घटनाओं के कारण काफी हद तक बदल गया है, तो भविष्य में संवैधानिक समीक्षा की जा सकती है।’’

इसमें कहा गया है कि संविधान की व्याख्या एक गतिशील प्रक्रिया है और इसे संवैधानिक सिद्धांतों के विकास तथा वैज्ञानिक ज्ञान में हुई प्रगति, दोनों के प्रति संवेदनशील बने रहना चाहिए।

न्यायालय ने कहा कि उसका फैसला केंद्र सरकार को इस बात की व्यापक समीक्षा करने से नहीं रोकता कि वर्तमान में मृत्युदंड देने की जो व्यवस्था है, उसके स्थान पर कोई वैकल्पिक तरीका अपनाया जा सकता है या नहीं। इसके लिए केंद्र किसी विशेषज्ञ समिति का गठन कर सकता है। इसका उद्देश्य यह देखना होगा कि दोषी को अनावश्यक पीड़ा से बचाने और उसकी गरिमा बनाए रखने के संवैधानिक उद्देश्य को कौन-सा वैकल्पिक तरीका बेहतर तरीके से पूरा कर सकता है।

पीठ ने कहा कि ऐसी कोई भी कार्रवाई पूरी तरह से सरकार और संसद के अधिकार क्षेत्र में आएगी और भविष्य के वैज्ञानिक या प्रौद्योगिकीय विकास को ध्यान में रखते हुए इसे नीतिगत मामले के तौर पर किया जा सकता है।

पीठ ने यह फैसला वरिष्ठ अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा की ओर से 2017 में दायर याचिका पर सुनाया। याचिका में कानून के तहत उन दोषियों को फांसी से मौत देने की मौजूदा व्यवस्था को हटाने का अनुरोध किया गया था जिन्हें मृत्युदंड सुनाया गया था।

न्यायालय ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 354(5) की संवैधानिक वैधता — जिसके तहत मौत की सजा पर अमल करने का एकमात्र तरीका फांसी देना है — की जांच तीन न्यायाधीशों की पीठ ने 1983 के फैसले में पहले ही कर ली थी और इस पर फैसला सुना दिया था।

पीठ ने यह भी कहा कि 1983 के फैसले पर एक संविधान पीठ ने और विचार किया था और उसे मंजूरी दी थी।

न्यायालय ने कहा कि उसे अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी की दलील में दम लगा कि याचिकाकर्ता भारत में मौजूदा कानूनी ढांचे के तहत फांसी या मौत की सजा देने की प्रक्रिया में गड़बड़ी का एक भी ऐसा मामला नहीं दिखा पाया, जिसके लिए कोई भरोसेमंद सबूत हो।

पीठ ने कहा, ‘‘इसके उलट, खुद मामले में शामिल होने वाले पक्ष की ओर से पेश किये गए सबूत दर्शाते हैं कि अमेरिका में, जहां कई राज्यों में मौत की सजा देने के लिए ‘घातक इंजेक्शन’ का तरीका अपनाया गया है, वहां ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिनमें यह प्रक्रिया ठीक से पूरी नहीं हो पाई और गड़बड़ी हुई।’’

पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता की यह दलील कि जानलेवा इंजेक्शन मौत की सज़ा देने का बेहतर और ज़्यादा मानवीय तरीका है, ‘पूरी तरह से बेअसर’ थी।

याचिका में फांसी की जगह ‘‘नस के जरिए घातक इंजेक्शन देकर, गोली मारकर, बिजली का झटका देकर या गैस चैंबर के जरिए’’ अपेक्षाकृत कम पीड़ादायक तरीकों से मृत्युदंड देने का अनुरोध किया गया था।

सुनवाई के दौरान मल्होत्रा ने कहा था कि मृत्युदंड पाए दोषी को कम से कम यह विकल्प दिया जाना चाहिए कि वह फांसी या घातक इंजेक्शन में से किस तरीके से मौत की सजा चाहता है।

मार्च 2023 में उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि वह इस बात की जांच के लिए विशेषज्ञों की एक समिति गठित करने पर विचार कर सकता है कि मृत्युदंड के दोषी को फांसी देना उचित और कम पीड़ादायक तरीका है या नहीं। न्यायालय ने इस संबंध में केंद्र से ‘‘बेहतर आंकड़े’’ भी मांगे थे।

हालांकि, शीर्ष न्यायालय ने यह स्पष्ट किया था कि वह विधायिका को मृत्युदंड देने का कोई विशेष तरीका अपनाने का निर्देश नहीं दे सकता।

केंद्र सरकार ने 2018 में इस कानूनी प्रावधान का पुरजोर समर्थन किया था कि मृत्युदंड के मामले में दोषी को केवल फांसी देकर ही मौत दी जाए। केंद्र ने पीठ से कहा था कि घातक इंजेक्शन और गोली मारने जैसे अन्य तरीके कम पीड़ादायक नहीं हैं।

गृह मंत्रालय के संयुक्त सचिव द्वारा दायर जवाबी हलफनामे में कहा गया था कि फांसी देकर मौत देना ‘‘त्वरित और सरल’’ है तथा इसमें ऐसी कोई चीज नहीं है जो कैदी की पीड़ा को ‘‘अनावश्यक रूप से बढ़ाए’’।

यह हलफनामा जनहित याचिका के जवाब में दायर किया गया था। याचिका में विधि आयोग की 187वीं रिपोर्ट का हवाला दिया गया था, जिसमें मृत्युदंड देने की मौजूदा व्यवस्था को हटाने की सिफारिश की गई थी।

भाषा सुभाष वैभव

वैभव


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