नयी दिल्ली, 26 फरवरी (भाषा) देश में न्यायाधिकरणों के कामकाज पर नाराजगी व्यक्त करते हुए, उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को कहा कि वे बिना किसी “जवाबदेही के बोझ और झंझट” बन गए हैं। न्यायालय ने इस बात को लेकर चिंता जताई कि एक वित्तीय न्यायाधिकरण के तकनीकी सदस्य “निर्णय लिखने का काम भी आउटसोर्स कर रहे थे”।
प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने टिप्पणी की कि न्यायाधिकरण “सरकार द्वारा बनाए गए” हैं और वे बिना किसी जवाबदेही के “अनियंत्रित” होकर कार्य कर रहे हैं।
न्यायालय पिछले साल के उस फैसले के मद्देनजर न्यायाधिकरणों के अध्यक्षों सहित सदस्यों के कार्यकाल को बढ़ाने की याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 को रद्द कर दिया गया था।
पीठ ने अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी से रिक्त पदों को तत्काल भरने के लिए कुछ व्यवस्था करने को कहा। साथ ही, पीठ ने इस बात पर प्रकाश डाला कि वर्तमान व्यवस्था के अनुसार, टीडीएसएटी न्यायाधिकरण का एक तकनीकी सदस्य अध्यक्ष की सेवानिवृत्ति पर अर्ध-न्यायिक निकाय का कार्यवाहक अध्यक्ष बन जाता है।
न्यायालय ने अटॉर्नी जनरल को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा कि ऐसे महत्वपूर्ण न्यायाधिकरणों में कोई कार्यात्मक संकट न हो, क्योंकि उसने ऐसी व्यवस्था पर आपत्ति जताई है जिसमें कोई तकनीकी सदस्य अध्यक्ष का पद संभाले।
सीजेआई सूर्यकांत ने कहा, “श्रीमान अटॉर्नी जनरल, न्यायाधिकरण आपकी (केंद्र सरकार की) रचना हैं, और वे सिरदर्द बन गए हैं। वे आपके लिए सिरदर्द हैं और हमारे लिए बोझ। उनके द्वारा पारित किए जाने वाले आदेशों के कारण वे हमारे लिए एक बोझ बन गए हैं। विधायी व्यवस्था के कारण उनके कामकाज का तरीका हमारे लिए एक चुनौती बनता जा रहा है।”
उन्होंने कहा, “अब जिस तरह के आदेश हम देख रहे हैं, कुछ न्यायाधिकरणों को छोड़कर, ये संस्थाएं एक तरह से ‘अनियंत्रित’ हो गई हैं क्योंकि वे न तो न्यायपालिका के प्रति जवाबदेह हैं और न ही पृथ्वी पर किसी के प्रति जवाबदेह हैं।”
अटॉर्नी जनरल ने कहा कि सरकार रिक्त पदों को शीघ्रता से भरने के लिए एक तंत्र विकसित करने का प्रयास कर रही है।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि यह राष्ट्रीय हित में नहीं है कि न्यायाधिकरण किसी के प्रति जवाबदेह न हों।
पीठ ने कहा कि अदालत मौजूदा सदस्यों को कार्यकाल का एकमुश्त विस्तार देने की इच्छुक नहीं थी, लेकिन न्यायाधिकरणों में रिक्तियों को नहीं भरे जाने के कारण ऐसा करने के लिए विवश थी।
सीजेआई ने कहा कि उनके पास एक महत्वपूर्ण न्यायाधिकरण के संबंध में विश्वसनीय जानकारी है, जो देश की अर्थव्यवस्था के कारण महत्वपूर्ण है और जहां तकनीकी सदस्य खुद फैसले नहीं लिख रहे थे।
उन्होंने कहा, “ये तकनीकी सदस्य एक भी फैसला नहीं लिख रहे हैं, वे इस बात पर जोर दे रहे हैं कि न्यायिक सदस्य उनकी ओर से और उनके नाम पर फैसला लिखें। मुझे तो एक तकनीकी सदस्य की धृष्टता का भी पता है, जिसने एक न्यायिक सदस्य से अपने नाम से फैसला लिखने को कहा और उन्हें ब्लैकमेल किया कि वह फैसले पर हस्ताक्षर नहीं करेगा।”
उन्होंने कहा, “न्यायाधिकरण के कुछ तकनीकी सदस्य वास्तव में निर्णयों को लिखने का काम आउटसोर्स कर रहे हैं, जो न्यायिक प्रणाली में पूरी तरह से अनसुनी बात है। मैं सचमुच बहुत परेशान हूं और उचित समय आने पर मैं उन्हें बर्खास्त कर दूंगा। न्यायाधिकरण बनाने के नाम पर हमने क्या झंझट खड़ा कर दिया है, बस ज्यादा बोझ न उठाने की चिंता में हमने यह सब कर दिया है।”
नाराज प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि इन तकनीकी सदस्यों को पर्यावरण कानून, कंपनी कानून और दिवालियापन कानूनों की समझ नहीं है और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को इन विषयों का ज्ञान नहीं मिल रहा है।
उन्होंने कहा, “इन न्यायाधीशों को पर्यावरण कानून, वाणिज्यिक कानून आदि का कोई अध्ययन नहीं कराया जाता है और उनसे चार साल के भीतर विशेषज्ञ बनने की अपेक्षा की जाती है। शायद एक बिल्कुल नए तंत्र की आवश्यकता है। जिस तरह से वे जवाबदेह नहीं हैं, वह राष्ट्रीय हित में नहीं है।”
पीठ ने न्यायाधिकरणों के अध्यक्षों के कार्यकाल को अंतरिम उपाय के रूप में अगले आदेश तक या वैकल्पिक व्यवस्था होने तक बढ़ाने का निर्देश दिया।
शीर्ष न्यायालय ने नवंबर 2025 में न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 के न्यायाधिकरण सदस्यों की नियुक्ति और कार्यकाल संबंधी प्रावधानों को रद्द कर दिया था।
भाषा प्रशांत अविनाश
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