न्यायालय ने 2005 से अलग रह रहे दंपति को दी तलाक की मंजूरी
न्यायालय ने 2005 से अलग रह रहे दंपति को दी तलाक की मंजूरी
नयी दिल्ली, दो सितंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने अलग रह रहे एक दंपति को तलाक की मंजूरी देते हुए बुधवार को कहा कि दोनों दिसंबर 2005 से अलग रह रहे हैं और पत्नी ने वैवाहिक संबंध तोड़ दिया था।
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर की पीठ ने पति को महिला को स्थायी गुजारा भत्ते के रूप में सात लाख रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया।
पीठ ने शीर्ष अदालत के एक पूर्व फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि हालांकि वैवाहिक कानून का प्राथमिक उद्देश्य विवाह को बचाना होता है, लेकिन जब पति-पत्नी लंबे समय तक अलग रहते हैं तो कानून को ऐसी स्थिति की वास्तविकता को स्वीकार करना चाहिए।
पीठ ने कहा, ‘‘इस मामले में तथ्य यह है कि दोनों पक्ष अलग रह रहे हैं। हालांकि प्रतिवादी (पत्नी) ने अपने बयान में कहा है कि वह वैवाहिक जिम्मेदारियां निभाने के लिए तैयार थी, लेकिन केवल ऐसा कहना पर्याप्त नहीं हो सकता, जब उसका व्यवहार इसके विपरीत दिखाई देता हो।’’
शीर्ष अदालत ने अपने ही एक अन्य फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि लंबे समय तक अलग रहना इस बात के आकलन में एक महत्वपूर्ण आधार हो सकता है कि क्या वैवाहिक संबंध को फिर से बहाल किया जा सकता है या नहीं।
शीर्ष अदालत ने यह फैसला पति की उस याचिका पर सुनाया, जिसमें उसने मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती दी थी। उच्च न्यायालय ने कहा था कि पति यह साबित करने में असफल रहा कि उसके साथ क्रूरता हुई या पत्नी ने उसे छोड़ा, इसलिए वह तलाक का हकदार नहीं है।
पीठ ने कहा, ‘‘जब सुनवाई अदालत के समक्ष यह साबित हो चुका था कि दोनों पक्ष दिसंबर 2005 से साथ नहीं रहे हैं, तो हमारे विचार में उच्च न्यायालय का यह निष्कर्ष सही नहीं था कि पत्नी की ओर से पति को छोड़ने की मंशा नहीं थी।’’
पीठ ने कहा कि रिकॉर्ड से पता चलता है कि पति अपनी पत्नी को वापस वैवाहिक घर लाने गया था, लेकिन उसने बिना किसी उचित कारण के उसके साथ जाने से इनकार कर दिया।
शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि दंपति की कोई संतान नहीं है और दोनों के बीच समझौता कराने के सभी प्रयास विफल रहे हैं।
पीठ ने कहा, ‘‘ऐसी परिस्थितियों में दोनों पक्षों को जबरन वैवाहिक संबंध में बनाए रखना न्याय के उद्देश्यों को पूरा नहीं करेगा।’’
उच्चतम न्यायालय ने कहा, ‘‘इसलिए हम मानते हैं कि प्रतिवादी पत्नी ने वैवाहिक संबंध को छोड़ दिया था और अपीलकर्ता पति ने पत्नी द्वारा परित्याग का आधार सफलतापूर्वक साबित किया है।’’
शीर्ष अदालत ने पति की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए उच्च न्यायालय के उस हिस्से को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि पत्नी द्वारा परित्याग का आधार साबित नहीं हुआ है।
पीठ ने कहा कि यह मामला एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति को दर्शाता है, जिसमें पति-पत्नी वर्ष 2005 से लगातार अलग रहने के बावजूद अपने वैवाहिक विवाद को सुलझाने में सफल नहीं हो सके।
शीर्ष अदालत ने कहा कि दोनों का विवाह जून 2003 में हुआ था।
पीठ ने कहा, ‘‘ऐसा कहा गया है कि विवाह के तुरंत बाद ही प्रतिवादी (पत्नी) पति की शैक्षणिक योग्यता के कारण उससे दूर होने लगी। यहां तक कि उसने पति को ‘अनपढ़’ और ‘देहाती’ कहकर उसका अपमान भी किया।’’ पीठ ने यह भी कहा कि महिला नवंबर 2005 में अपने मायके वापस चली गई थी।
पति ने जून 2007 में हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत पत्नी द्वारा परित्याग और मानसिक क्रूरता के आधार पर तलाक की याचिका दायर की थी।
भाषा रवि कांत रवि कांत नरेश
नरेश

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