नयी दिल्ली, 24 मार्च (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने ‘आईपैक’ पर छापेमारी के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा कथित तौर पर बाधा डाले जाने के मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की ओर से दायर याचिका की स्वीकार्यता पर आपत्ति जताने को लेकर मंगलवार को पश्चिम बंगाल सरकार से पूछताछ की और जांच एजेंसी से जुड़े अधिकारियों के मौलिक अधिकारों के बारे में सवाल किए।
शीर्ष अदालत ने टिप्पणी की कि ईडी के कुछ अधिकारियों ने अपनी व्यक्तिगत क्षमता में याचिकाएं दायर कर यह जानने का आग्रह किया है कि क्या वे केवल एजेंसी के अधिकारी होने के कारण भारत के नागरिक नहीं रह जाते हैं।
पश्चिम बंगाल सरकार ने ईडी की उस याचिका की स्वीकार्यता पर सवाल उठाया है जिसमें आरोप लगाया गया है कि 8 जनवरी को कोलकाता में राजनीतिक परामर्श फर्म ‘इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी’ (आईपैक) के कार्यालय की तलाशी के दौरान बनर्जी और राज्य के अन्य अधिकारियों ने बाधा डाली थी। यह छापेमारी धनशोधन जांच के सिलसिले में की गई थी।
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एन वी अंजारी की पीठ से बनर्जी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत अदालत में याचिका दायर करने वाले व्यक्ति को यह स्पष्ट रूप से बताना होगा कि उसके किस मौलिक अधिकार का उल्लंघन हुआ है।
न्यायमूर्ति मिश्रा ने टिप्पणी की, ‘‘कृपया ईडी के उन अधिकारियों के मौलिक अधिकारों पर ध्यान केंद्रित करें जिनके साथ अपराध किया गया है। यदि आप केवल ईडी, ईडी, ईडी पर ही ध्यान केंद्रित करते हैं और उस अपराध के शिकार हुए व्यक्तिगत अधिकारियों द्वारा दायर दूसरी याचिका को भूल जाते हैं, तो आप मुख्य मुद्दे से भटक सकते हैं और आपको कठिनाई का सामना करना पड़ेगा।’’
सिब्बल ने दलील दी कि याचिका दायर करने वाले व्यक्ति (उपनिदेशक रॉबिन बंसल) ने किसी भी मौलिक अधिकार के उल्लंघन का दावा नहीं किया है।
उन्होंने कहा, ‘‘इतना ही नहीं, यदि उन्हें कोई मौलिक अधिकार प्राप्त है, तो याचिका में यह बताना आवश्यक है कि किस मौलिक अधिकार का उल्लंघन हुआ है।’’ उन्होंने कहा कि इस विशेष मामले में ईडी एक व्यक्ति भी नहीं है।
सिब्बल ने कहा कि किसी वैधानिक कर्तव्य के पालन में कोई भी बाधा डालना मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं है।
उन्होंने कहा, ‘‘यदि कोई व्यक्ति किसी पुलिस अधिकारी के कार्य में बाधा डालता है, तो वह अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दायर नहीं कर सकता। वह धारा 226 के तहत भी याचिका दायर नहीं कर सकता। उसके कार्यों के निर्वहन के अधिकार का उल्लंघन करने और बाधा डालने के लिए अभियोग चलाया जाएगा।’’
न्यायमूर्ति मिश्रा ने टिप्पणी की, ‘‘यदि मुख्यमंत्री ईडी की जांच में हस्तक्षेप करते हैं और कोई अपराध करते हैं, तो ईडी के लिए आपके विचार से उपाय यह है कि वह मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली राज्य सरकार के पास जाए और उन्हें इसकी जानकारी दे और समाधान मांगे?’’
इस सवाल का जवाब देते हुए सिब्बल ने कहा, ‘‘माननीय न्यायाधीश यह मान रहे हैं कि मुख्यमंत्री ने कोई अपराध किया है।’’
सिब्बल ने कहा, ‘‘यदि ईडी धन शोधन निवारण अधिनियम के तहत जांच कर रही है और अधिकारियों के संज्ञान में कोई अन्य अपराध आया है, तो पीएमएलए की धारा 66 के अनुसार इस मामले में संबंधित एजेंसी की ओर से राज्य सरकार को सूचित किया जाना चाहिए।’’
इसके बाद न्यायमूर्ति मिश्रा ने कहा, ‘‘हम कुछ भी अनुमान नहीं लगा रहे हैं। यह आरोप है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘हमें गलत न समझें। हर आरोप कुछ तथ्यों पर आधारित होता है, अगर तथ्य ही न हों तो जांच की कोई जरूरत नहीं है। वे यही तो चाहते हैं कि सीबीआई जांच करे।’’
मुख्यमंत्री बनर्जी द्वारा छापेमारी के दौरान कथित रूप से बाधा डाले जाने के मामले में ईडी की याचिका की स्वीकार्यता पर सवाल उठाते हुए सिब्बल ने कहा कि याचिका के शीर्षक में जिन उपनिदेशक का नाम है वह छापेमारी के दौरान मौजूद नहीं थे।
मुख्यमंत्री की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने कहा कि सीबीआई जांच के लिए राज्य सरकार को सहमति देनी होती है और संवैधानिक न्यायालय के पास अन्य मामलों में यह शक्ति है।
सुनवाई बेनतीजा रही और यह 14 अप्रैल को जारी रहेगी।
ईडी ने आरोप लगाया है कि कथित कोयला चोरी घोटाले के संबंध में आईपैक कार्यालय और इसके निदेशक प्रतीक जैन के परिसर में की गई जांच और तलाशी अभियान के दौरान बनर्जी सहित राज्य सरकार ने हस्तक्षेप किया और बाधा डाली।
शीर्ष अदालत ने पश्चिम बंगाल में ईडी अधिकारियों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी पर रोक लगाते हुए राज्य पुलिस को छापेमारी की सीसीटीवी फुटेज को सुरक्षित रखने का भी निर्देश दिया था।
इसने बनर्जी, पश्चिम बंगाल सरकार, राज्य के पूर्व पुलिस महानिदेशक राजीव कुमार और शीर्ष पुलिस अधिकारियों को ईडी की उन याचिकाओं पर नोटिस जारी किया था जिनमें छापेमारी में बाधा डालने के आरोप में उनके खिलाफ सीबीआई जांच की मांग की गई थी।
भाषा नेत्रपाल रंजन
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