न्यायालय का लालू प्रसाद के खिलाफ सीबीआई की प्राथमिकी और आरोपपत्र रद्द करने से इनकार

न्यायालय का लालू प्रसाद के खिलाफ सीबीआई की प्राथमिकी और आरोपपत्र रद्द करने से इनकार

न्यायालय का लालू प्रसाद के खिलाफ सीबीआई की प्राथमिकी और आरोपपत्र रद्द करने से इनकार
Modified Date: April 13, 2026 / 05:44 pm IST
Published Date: April 13, 2026 5:44 pm IST

नयी दिल्ली, 13 अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रीय जनता दल (राजद) प्रमुख लालू प्रसाद और उनके परिवार के सदस्यों से जुड़े ‘जमीन के बदले नौकरी’ मामले में केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की एक प्राथमिकी को सोमवार को रद्द करने से इनकार कर दिया।

न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने हालांकि बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद (77) को सुनवाई के दौरान अधीनस्थ अदालत में पेश होने से छूट दे दी।

पीठ ने कहा, ‘‘हम धारा 17ए (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की) के इस्तेमाल से जुड़े मुद्दे पर कुछ नहीं कहते कि यह आगे से लागू होगा या पूर्व प्रभाव से। तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, याचिकाकर्ता को सुनवाई के समय कानूनी मुद्दा उठाने की आजादी दी जाती है।’’

उच्चतम न्यायालय ने प्रसाद को इस मामले में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए के लागू होने का मुद्दा उठाने की अनुमति दी।

सीबीआई की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने सुनवाई के दौरान दलील दी कि कानून की धारा 17ए का उपयोग तभी किया जाता, अगर आरोपी किसी निर्णय लेने वाले पद पर होते।

राजू ने दलील दी कि प्रसाद के खिलाफ धारा 17ए के तहत पूर्व अनुमति जरूरी नहीं है, क्योंकि न तो वह निर्णय लेने वाले व्यक्ति थे और न ही सिफारिश करने वाले।

लालू प्रसाद की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलील का विरोध करते हुए कहा कि अधिकारियों को जब तक अनुमति नहीं मिलती, जांच नहीं हो सकती।

सिब्बल ने कहा कि सीबीआई नौ साल बाद जागी है और उसने उसी आधार पर एक और आरोपपत्र दायर किया है, जिस पर मामला बंद हो चुका था।

इससे पहले, दिल्ली उच्च न्यायालय ने 24 मार्च को राजद प्रमुख को बड़ा झटका देते हुए उनके और उनके परिवार से जुड़े ‘‘जमीन के बदले नौकरी’’ मामले में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा दर्ज प्राथमिकी रद्द करने से इनकार कर दिया था।

अदालत ने राजद प्रमुख लालू प्रसाद की इस दलील को खारिज कर दिया था कि एजेंसी की कार्रवाई कानूनी रूप से टिकने लायक नहीं है, क्योंकि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए के तहत पूर्व अनुमति नहीं ली गई थी।

अधिकारियों ने बताया कि कथित ‘जमीन के बदले नौकरी’ का यह मामला लालू प्रसाद के रेल मंत्री रहने (2004 से 2009) के दौरान मध्य प्रदेश के जबलपुर में भारतीय रेलवे के पश्चिम मध्य जोन में की गई ‘ग्रुप डी’ नियुक्तियों से संबंधित है।

अधिकारियों के अनुसार कथित तौर पर ये नियुक्तियां उन जमीनों के बदले की गई थी, जिन्हें भर्ती होने वाले उम्मीदवारों द्वारा प्रसाद के परिवार के सदस्यों या सहयोगियों के नाम पर उपहार में दिया गया था या स्थानांतरित (ट्रांसफर) किया गया था

प्रसाद ने दलील दी थी कि इस मामले में जांच, प्राथमिकी, जांच की प्रक्रिया और बाद में दाखिल आरोपपत्र कानूनी रूप से टिकने योग्य नहीं हैं, क्योंकि केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने भ्रष्टाचार निरोधक कानून की धारा 17ए के तहत पूर्व मंजूरी नहीं ली थी।

भाषा वैभव दिलीप

दिलीप


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