वैवाहिक दुष्कर्म संबंधी याचिकाओं पर केंद्र के रुख के बाद सुनवाई की तारीख तय करेगा उच्चतम न्यायालय

वैवाहिक दुष्कर्म संबंधी याचिकाओं पर केंद्र के रुख के बाद सुनवाई की तारीख तय करेगा उच्चतम न्यायालय

वैवाहिक दुष्कर्म संबंधी याचिकाओं पर केंद्र के रुख के बाद सुनवाई की तारीख तय करेगा उच्चतम न्यायालय
Modified Date: September 7, 2026 / 12:52 pm IST
Published Date: September 7, 2026 12:52 pm IST

नयी दिल्ली, सात सितंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि वैवाहिक दुष्कर्म को अपराध की श्रेणी में लाने से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई की उपयुक्त तारीख तय करने से पहले वह केंद्र सरकार का रुख जानना चाहेगा।

वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष वैवाहिक दुष्कर्म के मामले में पति के खिलाफ अभियोजन से संबंधित एक याचिका का उल्लेख किया और अनुरोध किया कि याचिकाओं के इस समूह को नवंबर में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाए।

पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल रहीं।

पीड़ित पत्नी की ओर से पेश जयसिंह ने कहा कि इन मामलों को बुधवार को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है, लेकिन केंद्र ने अभी तक इस मामले में कोई ठोस जवाब दाखिल नहीं किया है और पक्षकारों ने भी एक-दूसरे को याचिकाओं की प्रतियां नहीं दी हैं।

वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा, ‘‘केंद्र ने अभी तक जवाब दाखिल नहीं किया है, केवल प्रारंभिक आपत्ति दर्ज की है। मैं नवंबर में सुनवाई की निश्चित तारीख चाहती हूं। हमने अभी तक याचिकाओं की प्रति का आदान-प्रदान नहीं किया है। हमें नहीं पता कि इन याचिकाओं में क्या समानताएं हैं और क्या अंतर हैं।’’

पीठ ने कहा, ‘‘मामला बुधवार के लिए सूचीबद्ध है। केंद्र सरकार की ओर से भी कोई पेश होगा। हम देखेंगे कि वे क्या कहते हैं और उसके बाद उसी के अनुसार सुनवाई की उपयुक्त तारीख तय करेंगे।’’

एक अन्य याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता करुणा नंदी ने कहा कि मामले की सुनवाई की कोई भी तारीख तय की जा सकती है, ताकि सभी पक्ष अपनी दलीलें और संबंधित दस्तावेज दाखिल करने की प्रक्रिया पूरी कर सकें।

न्यायालय को बताया गया कि इन याचिकाओं में आपराधिक कानून के तहत वैवाहिक दुष्कर्म से संबंधित प्रावधानों की संवैधानिक वैधता और उनकी व्याख्या का मुद्दा उठाया गया है।

भारतीय दंड संहिता (भादंसं) की धारा 375 में दिए गए अपवाद के तहत यदि पत्नी नाबालिग नहीं है तो किसी पुरुष द्वारा अपनी पत्नी के साथ यौन संबंध बनाना या यौन कृत्य करना दुष्कर्म नहीं माना जाता।

भादंसं की जगह लाई गई भारतीय न्याय संहिता में भी धारा 63 (दुष्कर्म) के अपवाद-2 में कहा गया है कि ‘‘किसी पुरुष द्वारा अपनी पत्नी के साथ यौन संबंध बनाना या यौन कृत्य करना दुष्कर्म नहीं है, जबकि पत्नी 18 वर्ष से कम उम्र की नहीं है।’’

शीर्ष न्यायालय ने 16 जनवरी, 2023 को उन कई याचिकाओं पर केंद्र से जवाब मांगा था, जिनमें भादंसं के उस प्रावधान को चुनौती दी गई थी, जो वयस्क पत्नी के साथ जबरन यौन संबंध बनाने के मामले में पति को अभियोजन से संरक्षण देता था।

बाद में अदालत ने इस मुद्दे पर भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) के समान प्रावधान को चुनौती देने वाली एक याचिका पर भी केंद्र को नोटिस जारी किया था।

हाल में लागू किए गए तीन नए आपराधिक कानून- भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम एक जुलाई, 2024 से लागू हुए और उन्होंने क्रमश: भादंसं, दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) और साक्ष्य अधिनियम की जगह ली।

इन याचिकाओं में से एक का संबंध इस मुद्दे पर दिल्ली उच्च न्यायालय के 11 मई, 2022 के खंडित फैसले से है। इस मामले में अपील एक महिला ने दायर की है, जो दिल्ली उच्च न्यायालय में दायर याचिकाओं में से एक की याचिकाकर्ता थी।

इस मामले में खंडित फैसला सुनाते हुए उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति राजीव शकधर और न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर ने इस बात पर सहमति जताई थी कि याचिकाकर्ताओं को उच्चतम न्यायालय में अपील की अनुमति दी जानी चाहिए, क्योंकि इस मामले में कानून से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल शामिल हैं, जिन पर शीर्ष अदालत के फैसले की जरूरत है।

खंडपीठ की अध्यक्षता करने वाले न्यायमूर्ति शकधर ने वैवाहिक दुष्कर्म के अपवाद को ‘‘असंवैधानिक’’ बताते हुए इसे हटाने के पक्ष में फैसला दिया था। उन्होंने कहा था कि भादंसं लागू होने के 162 साल बाद भी अगर किसी विवाहित महिला की न्याय की गुहार नहीं सुनी जाती है तो यह ‘‘दुखद’’ होगा।

वहीं, न्यायमूर्ति शंकर ने कहा था कि दुष्कर्म से संबंधित कानून में वैवाहिक दुष्कर्म के लिए दिया गया अपवाद असंवैधानिक नहीं है। उनके अनुसार, पति-पत्नी के संबंध को अन्य मामलों से अलग मानने के पीछे कानून में एक स्पष्ट और तर्कसंगत आधार मौजूद है।

कर्नाटक उच्च न्यायालय ने इससे पहले कहा था कि पति को अपनी पत्नी से दुष्कर्म और अप्राकृतिक यौन संबंध के आरोपों से छूट देना संविधान के अनुच्छेद 14, यानी कानून के समक्ष समानता के अधिकार के खिलाफ है।

ये याचिकाएं भादंसं की धारा 375 में दिए गए वैवाहिक दुष्कर्म संबंधी अपवाद के खिलाफ दायर जनहित याचिकाओं से जुड़ी हैं। इन याचिकाओं में इस अपवाद की संवैधानिक वैधता को इस आधार पर चुनौती दी गई है कि यह उन विवाहित महिलाओं के साथ भेदभाव करता है, जिनका उनके पति यौन उत्पीड़न करते हैं।

भाषा गोला वैभव

वैभव


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