तेजपाल दोषसिद्धि: उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के फैसले को अनुचित बताया

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तेजपाल दोषसिद्धि: उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के फैसले को अनुचित बताया

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  • Publish Date - August 6, 2026 / 06:49 PM IST,
    Updated On - August 6, 2026 / 06:49 PM IST

पणजी, छह अगस्त (भाषा) बंबई उच्च न्यायालय ने वर्ष 2013 के बलात्कार मामले में पत्रकार तरुण तेजपाल को दोषी ठहराते हुए बृहस्पतिवार को निचली अदालत के बरी करने के फैसले को अनुचित करार दिया।

उच्च न्यायालय ने साथ ही कहा कि निचली अदालत इस धारणा का शिकार हो गई कि ऐसे मामलों में शिकायतकर्ता को ‘‘आदर्श पीड़िता’’ होना चाहिए और उसे एक निश्चित तरीके से व्यवहार करना चाहिए।

न्यायमूर्ति नीला गोखले और न्यायमूर्ति अमित जमसांडेकर की पीठ ने 81 पृष्ठों के फैसले में बचाव पक्ष द्वारा पीड़िता को कठघरे में खड़ा करने और उसके निजी जीवन पर ध्यान केंद्रित करने के तरीके पर कड़ी आपत्ति जताई। पीठ ने कहा कि यह हैरान करने वाला है कि निचली अदालत ने जिरह के दौरान बचाव पक्ष को उसे ‘‘परेशान और अपमानित’’ करने दिया।

उच्च न्यायालय ने तेजपाल को बलात्कार और यौन उत्पीड़न मामले में 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाते हुए कहा कि पीड़िता ने सत्य बयान दिए और अभियोजन पक्ष ने अपना मामला ‘‘हर तरह के संदेह से परे’’ साबित किया।

इसने कहा कि मापुसा की निचली अदालत 2021 में तहलका के पूर्व प्रधान संपादक को बरी करते हुए इस धारणा के साथ आगे बढ़ी कि यौन उत्पीड़न की पीड़िता को एक रूढ़िबद्ध तरीके से व्यवहार करना चाहिए और इस मामले में उसे ‘‘आदर्श पीड़िता’’ होना चाहिए था।

उच्च न्यायालय ने कहा, ‘‘आदर्श पीड़िता की अवधारणा एक ऐसी अनकही सांस्कृतिक धारणा को दर्शाती है, जिसमें किसी व्यक्ति पर तभी पूरी तरह विश्वास किया जाता है, उसके प्रति सहानुभूति जताई जाती है और उसे विश्वसनीय माना जाता है, जब वह पूरी तरह असहाय, पूरी तरह निर्दोष और पूरी तरह असहाय दिखाई दे।’’

अदालत ने कहा कि जब कोई पीड़ित इस तय ढांचे में ‘‘फिट’’ नहीं बैठता है तो उसके आघात को अक्सर कमतर आंका जाता है।

पीठ ने कहा, ‘‘किसी पीड़िता से हमेशा दुखी, कमजोर या स्पष्ट रूप से टूटी हुई दिखने की अपेक्षा करना, निचली अदालत द्वारा मानवीय परिस्थितियों से निपटने के तरीकों की वास्तविकता को नजरअंदाज करना है। हालांकि, आदर्श पीड़िता की ये अवधारणाएं एक मिथक हैं। किसी पीड़ित की विश्वसनीयता का आकलन तथ्यों के आधार पर किया जाना चाहिए, न कि इस आधार पर कि वह किसी संकीर्ण सांस्कृतिक धारणा में फिट बैठती है या नहीं।’’

न्यायाधीशों ने कहा कि न तो निचली अदालत और न ही आरोपी यह तय कर सकते हैं कि अपराध के बाद पीड़िता को किस तरह प्रतिक्रिया देनी चाहिए थी या अपने आघात से कैसे निपटना चाहिए था।

उच्च न्यायालय ने कहा कि ‘‘हर व्यक्ति आघात से अलग-अलग तरीके से निपटता है’’ और केवल इस आधार पर पीड़िता की विश्वसनीयता पर संदेह नहीं किया जा सकता कि वह यौन उत्पीड़न के बाद कार्यक्रम स्थल छोड़कर नहीं गई।

पीठ ने कहा कि उस समय तेजपाल तहलका के प्रधान संपादक और मालिक थे, जबकि पीड़िता पत्रिका में प्रमुख संवाददाता थी, इसलिए ‘‘तेजपाल निश्चित रूप से उस पर नियंत्रण और प्रभुत्व की स्थिति में थे।’’

अदालत ने यह भी कहा कि तेजपाल ने पीड़िता का उत्पीड़न एक बार नहीं बल्कि लगातार दो दिन तक किया। पीठ ने कहा, ‘‘उन्होंने इसके बारे में अपनी बेटी को जानकारी देने के लिए भी पीड़िता को शर्मिंदा करने की कोशिश की।’’

बचाव पक्ष द्वारा पीड़िता के चरित्र पर सवाल उठाए जाने के प्रयास पर नाराजगी जताते हुए न्यायाधीशों ने कहा कि वह अपने बयान पर कायम रही और अदालत को उसकी गवाही पर विश्वास करने में कोई संकोच नहीं है।

अदालत ने कहा, ‘‘यह समझना चाहिए कि यौन हिंसा पीड़ित महिला अक्सर अपनी पीड़ा बताने में धीमी और झिझकने वाली होती है। इस मामले में पीड़िता ने आक्रामक जिरह के बावजूद अपनी गवाही पर दृढ़ता बनाए रखी।’’

पीठ ने कहा कि पीड़िता के बयान की पुष्टि कई अन्य गवाहों से भी हुई।

इसने बचाव पक्ष द्वारा पीड़िता के रहन-सहन और जीवनशैली को आधार बनाकर उसे ‘‘अनैतिक आचरण वाली और स्वच्छंद महिला’’ के रूप में चित्रित किए जाने की कोशिश पर भी आपत्ति जताई।

पीठ ने कहा, ‘‘उसे भी कानून का संरक्षण पाने का समान अधिकार है। केवल इसलिए उसकी गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता कि उस पर अनैतिक आचरण वाली महिला होने का आरोप लगाया गया है।’’

अदालत ने कहा कि किसी महिला के कथित ढीले नैतिक चरित्र के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि कोई व्यक्ति उसके साथ बलात्कार कर सकता है। अदालत ने कहा, ‘‘हर महिला को किसी के साथ यौन संबंध बनाने से इनकार करने का अधिकार है।’’

उच्च न्यायालय ने घटना के बाद तेजपाल द्वारा पीड़िता को भेजे गए माफी वाले ईमेल को भी ध्यान में रखा और कहा कि इन ईमेल में उन्होंने यौन उत्पीड़न को स्वीकार किया था।

अदालत ने कहा, ‘‘कोई भी समझदार व्यक्ति ऐसी घटना के लिए झूठी माफी नहीं मांगेगा, खासकर उनके (तेजपाल) जैसा व्यक्ति।’’

उच्च न्यायालय ने निचली अदालत द्वारा मामले की सुनवाई के तरीके पर भी नाराजगी जताई और कहा, ‘‘एक न्यायाधीश आपराधिक मुकदमे की सुनवाई केवल यह सुनिश्चित करने के लिए नहीं करता कि किसी निर्दोष व्यक्ति को सजा न मिले।’’

इसने कहा, ‘‘न्यायाधीश का कर्तव्य यह भी है कि कोई दोषी बच न जाए। दोनों ही सार्वजनिक कर्तव्य हैं।’’

उच्च न्यायालय ने कहा कि अदालत में पीड़िता की जिरह की विस्तृत समीक्षा से पता चलता है कि बचाव पक्ष ने बार-बार व्यक्तिगत रूप से उसी पर ध्यान केंद्रित किया, मानो ‘‘मुकदमे का सामना प्रतिवादी (तेजपाल) नहीं बल्कि वह खुद कर रही हो।’’

इसने कहा, ‘‘हमें सबसे अधिक हैरानी निचली अदालत की ओर से पीड़िता की जिरह के दौरान दिखाई गई खामोशी से हुई। यह आश्चर्यजनक है कि अदालत ने बचाव पक्ष को उसे परेशान और अपमानित करने दिया।’’

पीठ ने कहा कि निचली अदालत ने इस तथ्य को नजरअंदाज किया कि यौन उत्पीड़न का आघात झेल चुकी पीड़िता जिरह के दौरान शर्म, घबराहट या भ्रम महसूस कर सकती है।

अदालत ने कहा कि बचाव पक्ष ने न केवल पीड़िता के यौन उत्पीड़न के आरोपों को कमजोर करने का प्रयास किया, बल्कि उसे अनैतिक आचरण वाली महिला के रूप में पेश करने की कोशिश भी की, जिसका उद्देश्य ‘‘भय का माहौल पैदा करना और उसका मनोबल गिराना’’ था।

भाषा अमित नरेश नेत्रपाल

नेत्रपाल