तिरुवनंतपुरम, 13 जून (भाषा) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने शनिवार को शक्ति के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि यदि आप मजबूत हैं, तो “कोई कुछ नहीं कहेगा, भले ही आप वेनेजुएला पर कब्जा कर लें”।
यह वेनेजुएला के तत्कालीन राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के खिलाफ अमेरिकी कार्रवाई का परोक्ष संदर्भ था।
भागवत ने यहां आरएसएस के शताब्दी समारोह के तहत आयोजित एक कार्यक्रम में कहा कि हिंदुओं को अपनी रक्षा के लिए मजबूत बनना होगा, क्योंकि दुनिया केवल उन्हीं की सुनती है, जिनके पास ताकत होती है।
उन्होंने कहा, ‘‘दुनिया आपको केवल तभी सुनेगी, जब आप ताकतवर होंगे। यदि आप सच्चे हैं, तो यह आपकी बात नहीं सुनेगी। यदि आप मजबूत हैं, तो भले ही आप झूठ के रास्ते पर चलें, कोई आपत्ति नहीं करेगा। भले ही आप जाकर वेनेजुएला पर कब्जा कर लें, कोई कुछ नहीं कहेगा, क्योंकि आप मजबूत हैं। दुनिया ऐसी ही है।’’
उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिंदू समाज को मजबूत बनाने, उसे एकजुट करने और अपनत्व की भावना से जोड़ने का कार्य कर रहा है, “जैसा कि हम हमेशा से एक राष्ट्र रहे हैं, हैं और रहेंगे-और यह एक हिंदू राष्ट्र है।’’
साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि जब संघ ‘हिंदू’ कहता है, तो उसका मतलब केवल पूजा की एक पद्धति से नहीं होता।
उन्होंने कहा, ‘‘हिंदू के अंतर्गत पूजा-अर्चना के कई तरीके आते हैं। हिंदू हमारी ‘सांस्कृतिक पहचान’ है, जिसका मेरे अनुवाद के अनुसार अर्थ ‘सभ्यतागत पहचान’ होता है।’’
भागवत ने कहा कि जब स्वयंसेवक मुसलमानों और ईसाइयों से मिलते हैं, तो “हम उन्हें बताते हैं कि परंपराओं, पूर्वजों और अपने साथ ले जाई जाने वाली सांस्कृतिक विरासत के आधार पर आप भी हिंदू हैं,” लेकिन वे इससे असहमत होते हैं।
उन्होंने कहा कि संघ दुनिया का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन है, लेकिन इसे ‘‘सबसे ज्यादा गलत भी समझा गया’’।
उन्होंने कहा कि संगठन बाहर से लोगों को एक अर्धसैनिक संगठन जैसा लग सकता है-क्योंकि स्वयंसेवक वर्दी में पथ संचलन करते हैं-या फिर इसे एक अखिल भारतीय व्यायामशाला जैसा भी समझा जा सकता है, क्योंकि यह भारतीय खेलों और मार्शल आर्ट्स को बढ़ावा देता है।
उन्होंने कहा, ‘‘लेकिन आरएसएस यह सब कुछ नहीं है। संघ को बाहर से समझना कठिन है।’’
भागवत ने कहा, ‘‘आरएसएस को समझने का सबसे अच्छा तरीका है उससे जुड़ना और उसे भीतर से अनुभव करना। हालांकि, ऐसा करने के लिए पहले यह भरोसा होना चाहिए कि उसे परखना और समझना सुरक्षित है। एक व्याख्यान या पुस्तक संघ के बारे में कम से कम उतनी समझ तो प्रदान कर ही सकती है।’’
उन्होंने कहा कि आरएसएस न तो किसी विशेष स्थिति की प्रतिक्रिया है और न ही समाज के किसी वर्ग या राजनीतिक दल के विरोध में है।
अपने एक घंटे से अधिक लंबे भाषण में भागवत ने बताया कि आरएसएस की शुरुआत कैसे हुई और कहा कि इस अभियान के पीछे की सोच ‘हिंदुत्व’ है-जो कुछ नया या किसी के द्वारा बनाई गई अवधारणा नहीं है, बल्कि एक “परंपरा” है।
उन्होंने दावा किया, ‘‘उच्चतम न्यायालय का भी कहना है कि ये भारत की जीवंत परंपरा है।’’
भागवत ने कहा कि आरएसएस राजनीति में नहीं है, हालांकि इसके कई सदस्य राजनीति में हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि न तो राम जन्मभूमि और न ही अनुच्छेद 370 राजनीतिक मुद्दे थे, बल्कि उन्होंने इन्हें ‘‘देश की एकता और अखंडता से जुड़े प्रश्न’’ बताया।
आरएसएस प्रमुख ने हालिया ‘‘हिंदुत्व के उभार’’ पर भी बात की और कहा कि यह केवल संघ के कारण नहीं है, बल्कि कई लोगों द्वारा किए जा रहे कार्यों का नतीजा है।
उन्होंने कहा कि आरएसएस किसी को अपना विरोधी नहीं मानता।
उन्होंने कहा, ‘‘जो लोग हमारा विरोध करते हैं, हम उन्हें भविष्य के स्वयंसेवक के रूप में देखते हैं। हमारा लक्ष्य सभी को साथ लेकर समाज को संगठित करना है। किसी राष्ट्र का भाग्य किसी एक समूह द्वारा नहीं बदला जा सकता। यह काम राष्ट्र के समाज द्वारा ही किया जाना चाहिए।’’
उन्होंने कहा कि विविधताएं अस्थायी होती हैं और वे अस्तित्व की अंतर्निहित एकता की अभिव्यक्ति हैं।
भागवत ने सभी से आग्रह किया कि वे आरएसएस के बारे में दुष्प्रचार, विमर्श या सुनी-सुनाई बातों पर भरोसा न करें। उन्होंने कहा, ‘‘आइए और स्वयं देखिए तथा इसका अनुभव कीजिए। यह एक अनौपचारिक संगठन है। आप इसमें कभी भी शामिल हो सकते हैं और जब चाहें इसे छोड़ सकते हैं।”
भाषा
देवेंद्र दिलीप
दिलीप