नयी दिल्ली, आठ जून (भाषा) संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा सम्मेलन (यूएनएफसीसीसी) के तहत चार में से तीन वार्ता समूहों के 2030 के अपने जलवायु लक्ष्य की तुलना में सामूहिक रूप से नौ प्रतिशत अधिक उत्सर्जन करने का अनुमान है। एक नयी रिपोर्ट में यह बात सामने आई है।
ये तीन वार्ता समूह हैं- ‘अंब्रेला’ समूह (ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, आइसलैंड, इजराइल, जापान, कजाखस्तान, न्यूजीलैंड, नॉर्वे, यूक्रेन, अमेरिका और ब्रिटेन) यूरोपीय संघ (ईयू) और पर्यावरणीय अखंडता समूह (जॉर्जिया, लिकटेंस्टाइन, मेक्सिको, मोनाको, दक्षिण कोरिया और स्विट्जरलैंड)।
रिपोर्ट में कहा गया है कि चौथे समूह ‘बेसिक’ (ब्राजील, चीन, भारत और दक्षिण अफ्रीका) के देश ऐतिहासिक रूप से कम जिम्मेदार होने और विकास से जुड़ी अधिक चुनौतियों का सामना करने के बावजूद 2030 की अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के अधिक करीब हैं।
‘होल्डिंग अप द मिरर: ट्रैकिंग क्लाइमेट एक्शन एक्रॉस यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज नेगोशिएटिंग ग्रुप्स इन द एरा ऑफ जियोपॉलिटिकल अनसर्टेनिटी’ (आईना दिखाना: भू-राजनीतिक अनिश्चितता के दौर में यूएनएफसीसीसी वार्ता समूहों की जलवायु कार्रवाई का आकलन) शीर्षक वाला यह विश्लेषण दिल्ली स्थित ‘थिंक टैंक’ ऊर्जा, पर्यावरण और जल परिषद (सीईईडब्ल्यू) ने जारी किया है।
रिपोर्ट के लेखकों ने इस बात का आकलन करने के लिए देशों द्वारा यूएनएफसीसीसी को सौंपी गई उनकी जलवायु पारदर्शिता रिपोर्ट का इस्तेमाल किया कि प्रमुख वार्ता समूह सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं या नहीं।
वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन से निपटने की दिशा और प्रभावशीलता तय करने में इन समूहों की भूमिका अहम मानी जाती है।
विश्लेषण के अनुसार,‘अंब्रेला’ समूह, ईयू और ईआईजी के जिन सदस्य देशों का आकलन किया गया, उनमें केवल कजाखस्तान, जॉर्जिया और यूक्रेन के 2030 और 2035 जलवायु लक्ष्यों को हासिल करने का अनुमान है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि नॉर्वे अपना 2030 का लक्ष्य हासिल कर सकता है, जबकि न्यूजीलैंड अपना 2035 का लक्ष्य हासिल कर सकता है। कई अन्य देशों के अपने लक्ष्यों से पीछे रह जाने का अनुमान है।
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि ‘बेसिक’ समूह के सदस्य भारत ने अपनी कुल स्थापित क्षमता में गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों की 50 प्रतिशत हिस्सेदारी का लक्ष्य समय से पहले हासिल कर लिया है।
भारत उत्सर्जन तीव्रता और ‘कार्बन सिंक’ से जुड़े लक्ष्यों को हासिल करने में भी प्रगति कर रहा है। उसने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की तुलना में होने वाले उत्सर्जन की तीव्रता में करीब 37 प्रतिशत की कमी की है और करीब 2.4 अरब टीसीओ2ई (टन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य) का अतिरिक्त कार्बन सिंक तैयार किया है।
‘कार्बन सिंक’ से तात्पर्य ऐसी प्राकृतिक या कृत्रिम व्यवस्था से है जो वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को सोखकर अपने भीतर अवशोषित कर ले।
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सिम्मी नरेश
नरेश