कोलकाता, 18 जून (भाषा) तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में विभाजन पश्चिम बंगाल विधानसभा में बृहस्पतिवार को उस समय साफ दिखा जब पार्टी के प्रतिद्वंद्वी गुटों के सदस्य भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नीत सरकार के पहले बजट सत्र के शुरुआती दिन अलग-अलग बैठे।
यह घटनाक्रम विधानसभा चुनावों में टीएमसी की हार के बाद पार्टी में संकट की गंभीरता को दर्शाता है। विपक्ष के नेता रिताब्रता बनर्जी के खेमे से जुड़े विधायक एक ओर बैठे, जबकि पार्टी अध्यक्ष ममता बनर्जी द्वारा नामित नेता शोभनदेव चट्टोपाध्याय का समर्थन करने वाले विधायक अलग बैठे।
एक तरफ, 38 विधायक रिताब्रता बनर्जी और संदीपन साहा जैसे वरिष्ठ बागी नेताओं के साथ बैठे दिखे। वहीं, दूसरी तरफ लगभग 14 विधायकों का एक और समूह बैठा था, जिसमें शोभनदेव चट्टोपाध्याय, मदन मित्रा, कुणाल घोष, रुकबानुर रहमान और अलीफ़ा अहमद जैसे वरिष्ठ नेता शामिल थे।
कभी ममता बनर्जी के करीबी माने जाने वाले पूर्व मंत्री फिरहाद हकीम की रिताब्रता खेमे में मौजूदगी ने राजनीतिक हलकों में काफी ध्यान खींचा।
विधानसभा में बैठने की व्यवस्था से साफ संकेत मिला है कि टीएमसी पर नियंत्रण की लड़ाई संगठनात्मक बैठकों और अदालतों से आगे बढ़कर अब सदन तक पहुंच गई है।
पार्टी के संसदीय दल में भी फूट पड़ गई है, जहां तृणमूल के 20 सांसदों ने- जिनमें सुदीप बंदोपाध्याय और काकोली घोष दस्तीदार जैसे वरिष्ठ नेता भी शामिल थे- पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व से किनारा कर लिया और ‘नेशनलिस्ट सिटिजन पार्टी ऑफ़ इंडिया’ (एनसीपीआई) में विलय की बात की। उन्होंने दावा किया कि उन्हें पार्टी के लोकसभा सदस्यों में से दो-तिहाई से ज़्यादा का समर्थन हासिल है।
संसदीय दल में हुई इस बगावत ने सुदीप बंद्योपाध्याय की पत्नी और चौरंगी की विधायक नैना बंद्योपाध्याय के रुख को लेकर भी उत्सुकता बढ़ा दी। बृहस्पतिवार को उन्हें ममता बनर्जी से जुड़े विधायकों के साथ बैठे देखा गया।
भाषा आशीष अविनाश
अविनाश