नयी दिल्ली, 31 मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि पैसा कमाने के उद्देश्य से यौन शोषण के लिए बच्चों की तस्करी से जुड़े मामलों में यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम के तहत आरोप लगाए जा सकते हैं। साथ ही भारतीय न्याय संहिता और अनैतिक देह व्यापार (निवारण) अधिनियम के प्रासंगिक प्रावधान भी लागू होंगे।
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने शुक्रवार को यौनकर्मियों की चिंताओं को कम करने तथा अपराधियों के अभियोजन और पीड़ितों के पुनर्वास से जुड़े कानूनी ढांचे को स्पष्ट करते हुए कई निर्देश जारी किए।
पीठ ने कहा कि यदि किसी वयस्क पीड़ित के शोषण के लिए धमकी, बल प्रयोग, अन्य प्रकार की जबरदस्ती, अपहरण, धोखाधड़ी, छल, शक्ति का दुरुपयोग, कमजोर स्थिति का फायदा उठाना या किसी व्यक्ति की सहमति प्राप्त करने के लिए भुगतान अथवा लाभ देने-लेने जैसे तरीकों का इस्तेमाल किया गया हो, तो पीड़ित की सहमति का कोई महत्व नहीं रह जाता।
न्यायालय ने कहा, ‘‘मानव तस्करी के शिकार बच्चे की सहमति अप्रासंगिक है, चाहे ऐसे साधनों का उपयोग किया गया हो या नहीं। मानव तस्करी का अपराध साबित करने के लिए यह साबित करना जरूरी नहीं है कि पीड़ित ने सहमति नहीं दी थी।’’
उसने कहा, “ऐसे मामलों में ध्यान पूरी तरह अपराधियों की गतिविधियों और मंशा पर होना चाहिए। यदि तस्करी का अपराध और उसमें दबाव, धोखे या अन्य अवैध साधनों के प्रयोग को साबित कर दिया जाता है, तो पीड़ित की कथित सहमति को कोई कानूनी महत्व नहीं दिया जाना चाहिए।’’
पीठ ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति यह जानता भी हो कि उसे देह व्यापार या वेश्यावृत्ति में धकेला जा रहा है, तब भी वह तस्करी का शिकार हो सकता है क्योंकि हो सकता है कि उसे काम की वास्तविक परिस्थितियों के बारे में धोखा दिया गया हो और बाद में वे परिस्थितियां शोषणकारी साबित हुई हों।
उच्चतम न्यायालय ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 23 मानव तस्करी, बेगार और जबरन श्रम के सभी समान रूपों पर प्रतिबंध लगाता है। इसका दायरा व्यापक है और यह केवल राज्य के विरुद्ध ही नहीं, बल्कि ऐसे कार्यों में शामिल निजी व्यक्तियों पर भी लागू होता है।
पीठ ने कहा कि अनुच्छेद 23 और उससे जुड़े कानूनों की व्याख्या करते समय अदालतों ने हमेशा उदार दृष्टिकोण अपनाया है और शोषण की स्थिति में रहने वाले लोगों को संरक्षण और लाभ प्रदान किए हैं।
पीठ ने स्पष्ट किया कि भारतीय कानून में यह निर्विवाद है कि किसी भी बच्चे से जुड़ा यौन शोषण कानून की नजर में असहमति पर आधारित माना जाता है। पॉक्सो अधिनियम के तहत बच्चों के खिलाफ यौन उत्पीड़न, गंभीर यौन हमले तथा बाल यौन शोषण सामग्री के निर्माण, संग्रहण या कब्जे सहित सभी प्रकार के यौन अपराध आते हैं।
पीठ ने कहा, ‘‘इसलिए, जिन सभी मामलों में किसी बच्चे का यौन शोषण ऐसे कृत्यों से जुड़ा होगा जो पॉक्सो अधिनियम के तहत दंडनीय हैं, उनमें आरोपियों के खिलाफ पॉक्सो कानून के तहत आरोप तय किए जाएंगे और मुकदमा चलाया जाएगा। एक बार पॉक्सो अधिनियम लागू हो जाने पर अभियोजन प्रक्रिया के कई पहलुओं में महत्वपूर्ण बदलाव आ जाते हैं।’’
पीठ ने कहा, ‘‘अपराध की रिपोर्ट दर्ज करने, पीड़ित का बयान रिकॉर्ड करने और चिकित्सा जांच कराने की प्रक्रिया पॉक्सो अधिनियम के विशेष प्रावधानों द्वारा नियंत्रित होती है, जिन्हें बच्चे के हितों की रक्षा करने और उसके प्रति अधिक संवेदनशील बनाने के उद्देश्य से तैयार किया गया है।’’
यह आदेश उच्चतम न्यायालय की पीठ ने मानव तस्करी पर रोक लगाने और व्यावसायिक उद्देश्य से यौन शोषण के पीड़ितों के अधिकारों के प्रभावी क्रियान्वयन की मांग करने वाली प्रज्वला नामक गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया।
न्यायालय ने कहा कि उसका सचेत प्रयास यह रहा है कि मानव तस्करी के पीड़ितों को केवल बचाव की प्रतीक्षा कर रहे बेबस व्यक्तियों के रूप में न देखा जाए, बल्कि उन्हें ऐसे व्यक्तियों के रूप में पहचाना जाए जो अपने भविष्य और सशक्तीकरण के बारे में सोच-समझकर निर्णय लेने में सक्षम हैं।
पीठ ने कहा कि व्यावसायिक उद्देश्यों के वास्ते यौन शोषण के लिए मानव तस्करी के हर मामले में एक ही कानून या एक जैसी धाराएं लागू नहीं होतीं। यह इस बात पर निर्भर करता है कि मामला किस प्रकार का है।
उच्चतम न्यायालय ने यह भी कहा कि यदि पीड़ित का पुनर्वास नहीं किया जाता, तो वह दोबारा उन्हीं परिस्थितियों में लौट जाता है जिन्होंने उसे पहली बार शोषण का शिकार बनाया था।
भाषा गोला प्रशांत
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