सात मोड़ (उत्तराखंड), 13 जुलाई (भाषा) राजाजी राष्ट्रीय उद्यान के संवेदनशील हाथी गलियारे में प्रस्तावित ऋषिकेश-भानियावाला चार लेन राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना के विरोध में जारी जन आंदोलन के बीच सोमवार को भारी पुलिस बल की मौजूदगी में पेड़ों की कटाई का कार्य तेज कर दिया गया।
इस चौड़ीकरण परियोजना के तहत सात मोड़ क्षेत्र में 3,000 पेड़ काटने की योजना है। इसके विरोध में पिछले कई दिन से पर्यावरणविद, सामाजिक कार्यकर्ता, छात्र और स्थानीय नागरिक बड़ी संख्या में धरना-प्रदर्शन कर जंगलों और उनमें रहने वाले वन्यजीवों की सुरक्षा की मांग कर रहे हैं।
पेड़ों को बचाने के लिए सोमवार को प्रदर्शनकारी कई दशक पहले गौरा देवी के नेतृत्व में चले ‘चिपको आंदोलन’ की तर्ज पर पेड़ों से चिपक गए। हालांकि, भारी विरोध के बीच पुलिस ने उन्हें बलपूर्वक हटाकर वाहनों में बैठाया और मौके से ले गई।
इसके बाद एक-एक कर कई पेड़ों को काट दिया गया। इस दौरान अनेक प्रदर्शनकारियों की आंखों से आंसू भी छलक आए। उन्होंने सरकार पर विकास के नाम पर ‘‘पेड़ों का कत्ल’’ करने का आरोप लगाया।
हाथों में तख्तियां लिए प्रदर्शनकारियों का कहना है कि विकास के नाम पर प्राकृतिक धरोहर को नष्ट नहीं किया जा सकता।
पिछले कई दिनों से प्रतिदिन देहरादून से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी तय कर सात मोड़ पहुंच रहीं बीना वर्मा ने कहा, ‘‘विकास के नाम पर प्राकृतिक धरोहर को नष्ट नहीं किया जा सकता। लगातार हरे-भरे पेड़ काटे जा रहे हैं। डर है कि आने वाले समय में बच्चों को यह बताना पड़े कि यहां कभी एक घना जंगल हुआ करता था।’’
पर्यावरणविदों का कहना है कि परियोजना के कारण हजारों पेड़ों का नुकसान होगा, जिससे हाथियों सहित अन्य वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास और उनकी आवाजाही पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
उनका कहना है कि दून घाटी का यह क्षेत्र हाथियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण गलियारा है और बड़े पैमाने पर वृक्षों की कटाई से मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ने की आशंका है।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इतनी बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई से मिट्टी का कटाव बढ़ सकता है, भूजल पुनर्भरण प्रभावित हो सकता है और क्षेत्र की जैव विविधता को दीर्घकालिक नुकसान पहुंच सकता है।
उन्होंने सरकार से परियोजना के लिए वैकल्पिक मार्ग या ऐसी इंजीनियरिंग तकनीकों पर विचार करने की अपील की है, जिनसे जंगलों को न्यूनतम क्षति पहुंचे।
प्रख्यात पर्यावरणविद अनूप नौटियाल ने कहा कि यह विडंबना है कि एक ओर नागरिकों से मां और राष्ट्र के नाम पर पौधारोपण करने का आह्वान किया जाता है, जबकि दूसरी ओर विकास परियोजनाओं के नाम पर दशकों पुराने पेड़ों की कटाई की जा रही है।
उधर, भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) ने परियोजना का बचाव करते हुए कहा कि इसका उद्देश्य केवल आधुनिक और सुरक्षित सड़क का निर्माण करना नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और वन्यजीवों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी है।
एनएचएआई के देहरादून परियोजना निदेशक सौरभ सिंह ने बताया कि परियोजना का डिजाइन तैयार करते समय सड़क की क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ पर्यावरणीय प्रभाव को न्यूनतम रखने पर विशेष ध्यान दिया गया है।
उन्होंने कहा कि वन क्षेत्र में सड़क के लिए अधिगृहीत भूमि की चौड़ाई (राइट ऑफ वे) को यथासंभव सीमित रखा गया है। इसके अलावा उत्तराखंड वन विभाग, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया और भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) के तकनीकी सुझावों के आधार पर हाथियों और अन्य वन्यजीवों की सुरक्षित आवाजाही के लिए अंडरपास, पुलिया जैसी वैज्ञानिक संरचनाएं प्रस्तावित की गई हैं।
सिंह के अनुसार, इन उपायों से वन्यजीवों की प्राकृतिक आवाजाही बनी रहेगी और सड़क दुर्घटनाओं में वन्यजीवों की मौत की घटनाओं में भी कमी आएगी।
उन्होंने कहा कि एनएचएआई भविष्य की यातायात आवश्यकताओं को पूरा करने के साथ-साथ पर्यावरणीय संतुलन और वन्यजीव संरक्षण के उच्च मानकों का पालन करने के लिए प्रतिबद्ध है।
भाषा दीप्ति
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