पणजी, छह अगस्त (भाषा) वर्ष 1993 में प्रदर्शित सुपरहिट फिल्म ‘दामिनी’ दुष्कर्म के एक मामले की सुनवाई पर आधारित थी और अभिनेता सनी देओल द्वारा कहा गया संवाद ‘तारीख पे तारीख’ आज भी लोगों की जुबान पर है। इस फ़िल्म के भावनात्मक केंद्र में वह दृश्य है, जिसमें पीड़िता की गरिमा को सुनियोजित ढंग से और सबके सामने तार-तार कर दिया जाता है।
फिल्म ‘दामिनी’ के प्रदर्शन के 33 साल बाद पर्दे की कहानी असल जिंदगी की सुनवाई के दौरान तब बरबस याद आ गई जब बृहस्पतिवार को बंबई उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के बरी करने के फैसले को पलटते हुए तहलका के पूर्व संपादक तरुण तेजपाल को अपनी कनिष्ठ सहयोगी के साथ दुष्कर्म का दोषी ठहराया।
बंबई उच्च न्यायालय की गोवा पीठ ने अपने फ़ैसले में निचली अदालत की चुप्पी पर सवाल उठाए, जब बचाव पक्ष के वकील ने पीड़िता का आत्मविश्वास कम करने के लिए उसे परेशान करने वाली निजी बातें बताकर सबूत पेश करने की जिम्मेदारी उसी पर डाल दी थी।
समानताएं बहुत हैरान करने वाली थीं। ऐसा लग रहा था मानो सनी देओल और मीनाक्षी शेषाद्रि की वह फिल्म असल ज़िंदगी में उतर आई हो, जिसमें एक ताकतवर आदमी और एक कमज़ोर महिला की कहानी थी।
न्यायमूर्ति नीला गोखले और न्यायमूर्ति अमित एस. जमसांडेकर ने निचली अदालत के 2021 के फैसले को ‘गलत’ बताते हुए, एक युवती के साथ 2013 में यौन उत्पीड़न करने के लिए तेजपाल को 10 साल की सज़ा सुनाई।
उच्च न्यायालय ने कहा, ‘‘पीड़िता से जिरह की विस्तार से समीक्षा करने पर ज्ञात होता है कि बचाव पक्ष के वकील ने बार-बार उसपर ही ध्यान केंद्रित किया, मानो प्रतिवादी (तेजपाल) के बजाय उसी पर मुकदमा चल रहा हो। उसकी निजी जिंदगी की बारीकी से पड़ताल की गई, जिसमें उसके पुराने रिश्तों, घटना से पहले के सोशल मीडिया पोस्ट और सदमे पर उसकी सार्वजनिक प्रतिक्रियाओं का ज़िक्र आया।’’
न्यायालय ने कहा कि 1,000 पन्नों की जिरह का लगभग आधा हिस्सा खास विवरणों के बारे में बार-बार पूछे गए सवालों का है, जैसे कि प्रतिवादी के साथ अलग-अलग क्रियाओं के दौरान उसकी स्थिति क्या थी।
पीठ ने कहा गया, ‘‘यह घटना 2013 में हुई थी और 2018 से 2021 के बीच सबूत दर्ज किए गए थे। पांच साल बाद, गवाह के तौर पर पीड़िता से बार-बार दुष्कर्म की घटना की विस्तृत जानकारी देने को कहा गया। ऐसा तथ्यों को स्पष्ट करने या उसकी विश्वसनीयता की जांच करने के लिए नहीं, बल्कि उसके बयान में कमियां ढूंढने और उसे गलत तरीके से पेश करने के लिए किया गया।’’
न्यायालय ने टिप्पणी की कि पीड़िता के चरित्र की कड़ी और आलोचनात्मक नजरिये से जांच-पड़ताल की गई, जिससे वास्तव में तेजपाल के बजाय उसे ही कटघरे में खड़ा कर दिया गया।
यह लगातार चलने वाला संघर्ष ‘दामिनी’ फ़िल्म के आखिरी हिस्से की याद दिलाता है, जिसमें बचाव पक्ष का वकील ताकतवर लोगों को बचाने के लिए दामिनी की विश्वसनीयता और चरित्र पर लगातार हमले करता है और उसे मानसिक रूप से बुरी तरह तोड़ देता है।
ठीक वैसे ही जैसे फिल्म में होता है, जहां अदालत कक्ष को सबके सामने शर्मिंदा करने की जगह में बदल दिया जाता है, ताकि उसे पूरी तरह झुकाया जा सके।
भाषा धीरज सुरेश
सुरेश