नयी दिल्ली, 29 सितंबर (भाषा) तृणमूल कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य साकेत गोखले ने नए मतदाताओं के लिए फॉर्म-छह में एक नयी घोषणा जोड़ने के निर्वाचन आयोग के फैसले पर मंगलवार को सवाल उठाए।
गोखले ने इसके लिए विधि मंत्रालय द्वारा सूचना का अधिकार (आरटीआई) के तहत पूछे गये एक सवाल के जवाब का हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि प्रपत्र या उससे संबंधित नियमों में संशोधन के लिए निर्वाचन आयोग की ओर से मिले किसी भी प्रस्ताव की जानकारी उसके पास उपलब्ध नहीं है।
जुलाई में जोड़े गए इस घोषणापत्र के जरिये आवेदक से मतदाता सूची के अंतिम ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एसआईआर) में अपने माता-पिता या दादा-दादी/नाना-नानी के विवरण मांगे जाते हैं।
गोखले ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर लिखा, ‘मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार का झूठ एक बार फिर पकड़ा गया।’
उन्होंने कहा, ‘जुलाई 2026 में, निर्वाचन आयोग ने फॉर्म छह में एक नया ‘घोषणापत्र’ जोड़ा। इस घोषणापत्र में मतदाताओं से पिछले एसआईआर में उनके माता-पिता या दादा-दादी का विवरण मांगा गया था।’
सांसद के अनुसार, फॉर्म छह निर्वाचकों का पंजीकरण नियम, 1960 का हिस्सा है, जिसे केवल संशोधन के जरिए ही बदला जा सकता है।
उन्होंने कहा, ‘मैंने भारत सरकार से पूछा था कि क्या निर्वाचन आयोग ने फॉर्म छह को बदलने के लिए उन्हें पत्र लिखा था। जवाब मिला – नहीं।’
एक आरटीआई आवेदन के जरिए गोखले ने विधि मंत्रालय के तहत आने वाले विधायी विभाग से पूछा था कि क्या उसे फॉर्म छह या निर्वाचकों का पंजीकरण नियम, 1960 में संशोधन करने के लिए निर्वाचन आयोग से कोई प्रस्ताव मिला था, ताकि एसआईआर या आवेदक के माता-पिता या दादा-दादी को पिछली मतदाता सूची में शामिल करने से संबंधित घोषणापत्र को इसमें जोड़ा जा सके।
इसके जवाब में विभाग ने कहा, ‘ऐसी कोई जानकारी इस विभाग के पास उपलब्ध नहीं है।’
गोखले ने इस मामले में उच्चतम न्यायालय के फैसले का हवाला देने के निर्वाचन आयोग के रुख को भी चुनौती दी।
गोखले ने कहा, ‘इसके अलावा, ज्ञानेश कुमार अब दावा कर रहे हैं कि उच्चतम न्यायालय ने ‘फॉर्म छह को बदलने की निर्वाचन आयोग की शक्ति को बरकरार रखा’। यह गलत है। क्योंकि उच्चतम न्यायालय का फैसला मई 2026 में आया था, जबकि फॉर्म छह में दो महीने बाद, यानी जुलाई 2026 में बदलाव किया गया।’
उन्होंने सवाल उठाया, ‘उच्चतम न्यायालय निर्वाचन आयोग के किसी ऐसे कदम को कैसे ‘बरकरार’ रख सकता है जो उस समय तक उठाया ही नहीं गया था?’
भाषा सुमित सुरेश
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