(अलिंद चौहान)
नयी दिल्ली, 14 अप्रैल (भाषा) कमजोर ग्रिड ढांचा, छोटे विकासकर्ताओं के लिए वित्तीय बाधाएं, भूमि तक पहुंच की समस्याएं और कम शुल्क दरें उन प्रमुख अड़चनों में शामिल हैं, जिन्होंने कृषि में सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने वाली भारत की प्रमुख योजना प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान (पीएम-कुसुम) की प्रगति को धीमा कर दिया है। एक नए अध्ययन में यह बात सामने आई है।
इस योजना का लक्ष्य पहले चरण में मार्च 2026 तक 34.8 गीगावाट सौर ऊर्जा क्षमता स्थापित करना था, लेकिन अब तक केवल 14 गीगावाट ही ऑनलाइन हो पाया है।
पीएम-कुसुम एक महत्वपूर्ण पहल है क्योंकि इसका उद्देश्य किसानों को ऊर्जा और जल सुरक्षा प्रदान करना, उनकी आय बढ़ाना, कृषि क्षेत्र को डीजल मुक्त करना और पर्यावरण प्रदूषण को कम करना है।
इन कमियों का आठ अप्रैल को प्रकाशित एक अध्ययन ‘‘भारत में सिंचाई के लिए सौर ऊर्जा का विस्तार: पीएम-कुसुम से सबक’’ में जिक्र किया गया था। यह अध्ययन ऊर्जा, पर्यावरण और जल परिषद (सीईईडब्ल्यू), विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नीति अध्ययन केंद्र (सीएसटीईपी) तथा इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट (आईआईएसडी) द्वारा किया गया था।
आईआईएसडी के वरिष्ठ नीति सलाहकार अनस रहमान ने ‘पीटीआई-भाषा’ से बातचीत में कहा, ‘‘हालांकि हाल के वर्षों में अधिकांश राज्य कम दरों के मुद्दे से निपटने में सक्षम रहे हैं, ग्रिड बुनियादी ढांचा और भूमि की उपलब्धता अभी भी एक चुनौती बनी हुई है। योजना के दूसरे चरण को लागू करते समय इन चुनौतियों का समाधान करना आवश्यक है।’’
रहमान ने कहा कि आने वाले महीनों में लक्षित सौर क्षमता हासिल कर ली जानी चाहिए, क्योंकि कई परियोजनाएं प्रस्तावित हैं।
नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय ने 28 मार्च को जारी एक कार्यालय आदेश में कहा, ‘‘पीएम कुसुम परियोजनाओं को पूरा करने के लिए, जिनके लिए पीपीए (विद्युत खरीद समझौते)/ एनटीपी (कार्यवाही शुरू करने की सूचना) पर पिछले साल 31 दिसंबर को या उससे पहले हस्ताक्षर किए गए हैं, यह निर्णय लिया गया है कि समय सीमा को अगले साल 31 मार्च तक बढ़ाया जाएगा।’’
पीएम-कुसुम योजना के घटक
यह योजना 2019 में शुरू की गई थी और इसके तीन घटक हैं। घटक ‘ए’ के तहत, किसान अपनी भूमि पर सौर ऊर्जा संयंत्र (0.5 मेगावाट से 2 मेगावाट क्षमता के बीच) स्थापित कर सकते हैं, उन्हें ग्रिड से जोड़ सकते हैं और अतिरिक्त आय के लिए बिजली बेच सकते हैं। इस घटक में कोई सरकारी सब्सिडी नहीं है। किसानों को पूरा निवेश स्वयं वहन करना पड़ता है।
घटक बी में ऑफ-ग्रिड सौर सिंचाई पंपों की स्थापना शामिल है, जिसका अर्थ है कि खेत में लगा एक छोटा सौर पैनल एक ऐसे सिंचाई पंप को बिजली प्रदान करता है जो ग्रिड से जुड़ा नहीं होता है। इस घटक का उद्देश्य महंगे डीजल पंप को बदलना है, जो पर्यावरण को भी प्रदूषित करते हैं। ऑफ-ग्रिड सौर सिंचाई पंप रियायती शुल्क पर उपलब्ध कराए जाते हैं, जिनका खर्च केंद्र सरकार और संबंधित राज्य सरकारें साझा करती हैं।
घटक सी के दो भाग हैं। सी-आईपीएस (इंडिविजुअल पंप सोलराइजेशन), जिसमें प्रत्येक खेत में एक छोटा सौर संयंत्र स्थापित किया जाता है, जो छत पर सौर प्लेट के समान होता है, और किसानों को बिजली का उपयोग करने और अतिरिक्त बिजली को बिजली वितरण कंपनियों को बेचने की अनुमति देता है।
रहमान ने कहा, ‘‘सी-एफएलएस को योजना में बाद में जोड़ा गया। इसका कारण यह है कि सी-आईपीएस को उतना समर्थन नहीं मिला, क्योंकि इसके तहत किसानों को संयंत्र की लागत का कम से कम 10 प्रतिशत योगदान देना अनिवार्य था, जो कई किसान देने को तैयार नहीं थे।’’
उन्होंने कहा, ‘‘सी-एफएलएस ने डिस्कॉम को सौर संयंत्र में निवेश करने की अनुमति दी। हालांकि इसका मतलब यह है कि किसान आय के लिए बिजली वापस नहीं बेच सकते, लेकिन उन्हें बिना निवेश किए दिन के समय बिजली मिलती है।’’
भाषा आशीष माधव
माधव