पश्चिम बंगाल : तूफान प्रभावित मौसुनी द्वीप को अनिश्चितता के बादलों ने घेरा

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पश्चिम बंगाल : तूफान प्रभावित मौसुनी द्वीप को अनिश्चितता के बादलों ने घेरा

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  • Publish Date - May 30, 2021 / 02:28 PM IST,
    Updated On - November 29, 2022 / 08:42 PM IST

(अमिताभ रॉय)

मौसुनी (पश्चिम बंगाल), 30 मई (भाषा) बंगाल के मौसुनी द्वीप पर रहने वाले हजारों लोग जीविकोपार्जन के लिए कृषि और पर्यटन पर निर्भर हैं लेकिन ‘यास’ तूफान की वजह से उनके भविष्य पर अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे हैं जो पहले ही कोविड-19 महामारी से परेशानी का सामना कर रहे थे।

दक्षिण 24 परगना जिले के प्रशासन ने भरोसा दिया है कि जल्द ही उन तक राहत पहुंचेगी लेकिन ग्रामीणों की चिंता है कि उन्हें फिर से अपने पैरों पर खड़ा होने में लंबा समय लग सकता है।

दिन में वरिष्ठ प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों के साथ द्वीप पर पहुंचे सुंदरबन मामलों के मंत्री बंकिम हजारा ने कहा कि प्रभावित ग्रामीणों में पका हुआ खाना, पानी और दवाएं वितरित की जा रही हैं और सभी तक राहत पहुंचेगी।

यहां स्थापित सामुदायिक रसोई की शुरुआत की गई है जिसमें एक हजार लोगों के खाने की व्यवस्था है।

हालांकि, बंगाल की खाड़ी और हुगली नदी के संगम स्थल पर बसे इस द्वीप पर कृषि योग्य भूमि और मत्स्यपालन तालाब बुधवार की सुबह ‘यास’ तूफान की वजह से समुद्र के खारे पानी से भर गए और इसके बाद इलाके में हुई भारी बारिश ने मुश्किल और बढ़ा दी।

द्वीप के दक्षिण हिस्से जहां पर नारियल के पेड़ और मनमोहक तट हैं के लोग वर्ष 2020 तक फलते फूलते पर्यटन उद्योग से रोजगार पा रहे थे लेकिन महामारी और उसके बाद अम्फान तूफान ने इलाके को तबाह कर दिया।

पिछले हफ्ते आई प्राकृतिक आपदा ने स्थिति को और बिगाड़ दिया, अब भी कई घर पानी में डूबे हैं और ग्रामीण बेसब्री से सरकारी मदद का इंतजार कर रहे हैं।

यहां के बल्लियारा गांव स्थित ‘सोनार टोरी’ रिजॉर्ट के मालिक तपन मंडल कहते हैं, ‘‘स्थिति खराब है…महामारी से पर्यटन उद्योग बुरी तरह से प्रभावित हुआ है और इस तूफान ने इलाके को पूरी तरह से नष्ट कर दिया।’’

उन्होंने कहा, ‘‘जब तक सरकार कई लोगों को रोजगार देने वाले यहां के पर्यटन कारोबार की मदद नहीं करती तबतक यहां बहार नहीं आ पाएगी।’’

मछली पालन से रोजी-रोटी चलाने वाले सुबोध दास कहते हैं कि उनके दो तलाबों की मछलियां खारे पानी की वजह से मर गई जबकि वह मीठे पानी में रोहू, कत्ला और टेंगरा प्रजाति की मछलियां पालते थे।’’

उन्होंने कहा, ‘‘ भविष्य अनिश्चित है…मैं बचत से घर चला रहा हूं, नियमित आय खोने के बाद खर्चे पूरे करने के लिए रास्ते तलाश रहा हूं।’’

यहां के छोटे किसान आलम शेख कहते हैं कि मिट्टी की ऊपरी परत बह गई और खारा पानी जमा है जिससे अगले दस साल तक खेती नहीं की जा सकती।

भाषा धीरज नरेश

नरेश