गर्भपात कराने के लिए महिला की सहमति ही मायने रखती है : पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय
गर्भपात कराने के लिए महिला की सहमति ही मायने रखती है : पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय
चंडीगढ़, एक जनवरी (भाषा) पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने एक महिला को पति की सहमति के बिना गर्भपात कराने की अनुमति देते हुए कहा है कि इस मामले में विवाहित महिला की इच्छा और सहमति ही मायने रखती है।
अदालत ने यह निर्देश पंजाब की 21 वर्षीय एक महिला की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया। विवाहित महिला ने गर्भावस्था की दूसरी तिमाही में गर्भपात कराने की अनुमति मांगी थी।
याचिकाकर्ता ने बताया था कि उसकी शादी दो मई, 2025 को हुई थी और पति के साथ उसके संबंध तनावपूर्ण रहे।
पिछली सुनवाई में, अदालत ने स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (पीजीआईएमईआर) को याचिकाकर्ता की जांच के लिए एक मेडिकल बोर्ड गठित करने का निर्देश जारी किया था।
चिकित्सा रिपोर्ट के अनुसार, महिला चिकित्सकीय रूप से एमटीपी (गर्भावस्था का चिकित्सकीय समापन) कराने के लिए ‘फिट’ थी।
23 दिसंबर की रिपोर्ट के अनुसार, गर्भ में 16 सप्ताह और एक दिन का एक जीवित भ्रूण है, जिसमें किसी प्रकार की जन्मजात विकृति नहीं पाई गई।
मेडिकल बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में कहा, ‘‘ मरीज पिछले छह महीनों से अवसाद और चिंता के लक्षणों से ग्रस्त है, और उसका इलाज चल रहा है लेकिन उसमें बहुत कम सुधार हुआ है। तलाक की कार्यवाही के बीच महिला अपनी गर्भावस्था को लेकर बेहद परेशान है। यह सलाह दी जाती है कि वह अपना मानसिक उपचार और परामर्श जारी रखे। वह सहमति देने के लिए मानसिक रूप से स्वस्थ है।’’
न्यायमूर्ति सुवीर सहगल की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि रिपोर्ट से स्पष्ट है कि विशेषज्ञों के अनुसार याचिकाकर्ता गर्भपात के लिए चिकित्सकीय रूप से उपयुक्त स्थिति में है।
अदालत ने कहा कि विचार का एकमात्र प्रश्न यह है कि ऐसे गर्भसमापन से पहले अलग रह रहे पति की सहमति आवश्यक है या नहीं।
अदालत ने स्पष्ट किया कि चिकित्सा गर्भसमापन अधिनियम, 1971 में पति की स्पष्ट या निहित सहमति का कोई प्रावधान नहीं है।
अदालत ने कहा, “विवाहिता महिला ही सबसे उपयुक्त निर्णयकर्ता होती है कि वह गर्भ को रखना चाहती है या गर्भपात कराना चाहती है। उसकी इच्छा और सहमति ही सबसे महत्वपूर्ण है।”
भाषा रवि कांत रवि कांत पवनेश
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