इंदौर, आठ अप्रैल (भाषा) मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में धार के भोजशाला विवाद के मुकदमे में हिंदू पक्ष ने बुधवार को दलील दी कि कोई मंदिर ध्वस्त किए जाने के बाद भी अपना धार्मिक और कानूनी स्वरूप बरकरार रखता है जिससे भक्तों को उस स्थान पर उपासना का अधिकार मिलता है।
भोजशाला को हिंदू समुदाय वाग्देवी (देवी सरस्वती) का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष 11वीं सदी के इस स्मारक को कमाल मौला मस्जिद बताता है। यह विवादित परिसर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा संरक्षित है।
उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ इस परिसर के धार्मिक स्वरूप के विवाद को लेकर दायर चार याचिकाओं और एक रिट अपील पर छह अप्रैल से नियमित सुनवाई कर रही है।
सुनवाई के तीसरे दिन याचिकाकर्ताओं में शामिल संगठन ‘हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस’ के वकील विष्णु शंकर जैन ने न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी के सामने अपनी विस्तृत दलीलें पेश करना जारी रखा।
जैन ने खंडपीठ के सामने अपने केंद्रीय तर्क को दोहराया कि ‘ऐतिहासिक रिकॉर्ड और वैज्ञानिक सबूतों’ के मुताबिक भोजशाला का सरस्वती मंदिर विवादित परिसर पर (मस्जिद के मुकाबले) पहले से मौजूद था, इसलिए वहां केवल हिंदुओं को उपासना का अधिकार दिया जाना चाहिए।
हिंदू पक्ष के वकील ने दावा किया कि धार के परमार राजवंश के राजा भोज द्वारा वर्ष 1034 में बनाया गया यह मंदिर मध्यकालीन भारत के शासक अलाउद्दीन खिलजी के हुक्म पर 1305 में ढहाया गया था।
उन्होंने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत प्रदत्त धार्मिक अधिकारों का हवाला देते हुए कहा,‘‘खिलजी जैसे क्रूर आक्रांताओं के हमलों के बाद हिंदू देवी-देवताओं और उनके भक्तों के अधिकारों पर ग्रहण लग गया था। जैसे ही 1950 में भारत का संविधान लागू हुआ, ये अधिकार बहाल हो गए। हम अपनी याचिका में इन्हीं मूलभूत अधिकारों की मांग कर रहे हैं।’’
जैन ने दलील दी कि कोई मंदिर ढहाए जाने या इसमें स्थापित मूर्तियां तोड़े जाने के बाद भी उस जगह देवी-देवता ‘अप्रत्यक्ष या अदृश्य रूप में’ विराजमान रहते हैं, इसलिए भोजशाला परिसर में केवल हिंदुओं को उपासना का अधिकार है।
उन्होंने हिंदुओं द्वारा नर्मदा और गंगा जैसी पवित्र नदियों और चित्रकूट के कामदगिरि पर्वत की पूजा का उल्लेख करते हुए कहा कि ‘उपासना के लिए हमेशा मूर्ति होनी जरूरी नहीं है।’
जैन का यह तर्क हिंदू पक्ष की इस दावे के लिहाज से बेहद अहम है कि भोजशाला परिसर के मंदिर में स्थापित सरस्वती की मूर्ति फिलहाल लंदन के एक संग्रहालय में रखी है।
हिंदू पक्ष के वकील ने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि किसी मंदिर के नष्ट होने पर भी उसका कानूनी स्वरूप समाप्त नहीं होता।
अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के मुकदमे में उच्चतम न्यायालय के सुनाए ऐतिहासिक फैसले और अन्य न्यायिक मिसालों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि हिंदू देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को ‘कानूनी व्यक्ति’ के रूप में मान्यता प्राप्त है और मंदिरों की भौतिक संरचना या प्रतिमाओं के नष्ट होने पर भी उनका अंतर्निहित ‘पवित्र उद्देश्य’ बना रहता है।
हिंदू पक्ष के वकील ने तर्क दिया,’अगर एक बार कोई मंदिर स्थापित हो जाए, तो वह जगह हमेशा मंदिर ही रहती है।’’
जैन ने अलग-अलग कानूनी प्रावधानों को आधार बनाते हुए मुस्लिम पक्ष के इस दावे का एक बार फिर खंडन किया कि भोजशाला का विवादित परिसर वक्फ (धर्मार्थ अर्पित) संपत्ति है।
उन्होंने कहा कि इस परिसर में एक विवादित ढांचे के निर्माण के लिए ‘वैध वक्फ’ कभी स्थापित नहीं किया गया था।
जैन ने कहा,‘‘खुद इस्लामी कानून एक मंदिर को ढहाए जाने के बाद वहां किसी मस्जिद के निर्माण की इजाजत नहीं देता।’’
भाषा हर्ष रंजन
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