बैतूल, 25 अगस्त (भाषा) मध्यप्रदेश के बैतूल जिले के चोपना पुनर्वास क्षेत्र की करीब 50 छात्राओं, उनके अभिभावकों और ग्रामीणों ने मंगलवार को करीब 70 किलोमीटर की यात्रा कर जिला मुख्यालय स्थित समाहरणालय पहुंचकर धरना दिया और खस्ताहाल कच्चे संपर्क मार्ग को पक्की सड़क में बदलने की मांग की।
छात्राओं और ग्रामीणों के अनुसार, चोपना पुनर्वास क्षेत्र में लखीपुर से झोली-1 तक करीब 1.8 किलोमीटर लंबा मार्ग वर्षों से कच्चा है।
उन्होंने बताया कि बारिश के दौरान यह मार्ग कीचड़ और गड्ढों में तब्दील हो जाता है, जिससे आवागमन प्रभावित होता है तथा विद्यार्थियों को स्कूल जाने में परेशानी होती है।
यह मार्ग चिखलपाटी, लखीपुर, झोली-1 समेत करीब 14 गांवों के हजारों लोगों के लिए चोपना आने-जाने का मुख्य संपर्क मार्ग है।
जिलाधिकारी सौरभ संजय सोनवणे ने छात्राओं और ग्रामीणों को समस्या के जल्द समाधान का आश्वासन दिया।
उन्होंने विरोध के तरीके को ‘‘अनुचित’’ बताते हुए कहा कि यह सोशल मीडिया के मौजूदा चलन से प्रभावित प्रतीत होता है।
सोनवणे ने संवाददाताओं से कहा कि मामले के शासन के संज्ञान में होने के बावजूद छात्राओं का इस तरह शिकायत लेकर पहुंचना उचित नहीं है।
उन्होंने दावा किया कि छात्राओं ने भी स्वीकार किया है कि सोशल मीडिया के मौजूदा चलन को देखते हुए उन्होंने यह कदम उठाया।
सोनवणे ने कहा, ‘‘कई बार अनावश्यक रूप से मामले पर प्रकाश डालने के लिए बच्चों को आगे रखने की जो प्रक्रिया चल रही है, वह भी अनुचित है।’’
उन्होंने कहा कि इससे बच्चों की सुरक्षा प्रभावित होती है, जबकि समस्या बातचीत के जरिए ही हल की जा सकती है।
अधिकारी ने कहा कि प्रशासन से संपर्क के सभी विकल्प खुले हैं और लोग इनके जरिए विभिन्न अधिकारियों तक अपनी समस्याएं पहुंचा सकते हैं।
इससे पहले छात्राओं और ग्रामीणों ने जिलाधिकारी कार्यालय के बाहर करीब एक घंटे तक फर्श पर बैठकर धरना दिया।
बाद में जिलाधिकारी ने कुछ छात्राओं और ग्रामीणों को अपने कक्ष में बुलाकर उनकी समस्या सुनी।
छात्रा चंदना मिस्त्री ने बताया कि स्कूल जाने वाला रास्ता कच्चा और कीचड़ से भरा है, जिससे आने-जाने में काफी दिक्कत होती है।
छात्रा किरण ने कहा कि रास्ते में कई बार छात्राएं गिर जाती हैं और किताबें भीग जाती हैं।
ग्रामीण लक्ष्मण हलदार ने कहा कि लगातार शिकायतों के बावजूद वर्षों से समस्या का समाधान नहीं हुआ है।
उन्होंने बताया कि एक वैकल्पिक मार्ग है, लेकिन उसमें नदी पार करनी पड़ती है और दूरी भी करीब 10 किलोमीटर अधिक है।
जिलाधिकारी से आश्वासन मिलने के बाद छात्राएं, उनके परिजन और ग्रामीण निजी वाहनों से गांव लौट गए।
भाषा ब्रजेन्द्र जितेंद्र
जितेंद्र