Mohan Lal Dwivedi Rewa: 50 साल से नहीं आई नींद...इमरजेंसी के बाद से लगातार जाग रहे रिटायर्ड ज्वाइंट कलेक्टर, ना होती है थकान ना कोई बीमारी / Image: IBC 24
रीवा: Mohan Lal Dwivedi Rewa विज्ञान ने आज इतनी तरक्की कर ली है कि हम एआई की दुनिया में जी रहे हैं। हर हाथ में मोबाइल और हर मोबाइल में एआई… ये विज्ञान का ही चमत्कार है। लेकिन प्रकृति के कई ऐसे रहस्य हैं जहां जाकर विज्ञान भी जवाब दे देता है। ऐसा ही एक मामला मध्यप्रदेश के रीवा से सामने आया है, जहां एक शख्स 50 साल से नहीं सोया है। जरा सोचिए, अगर आपको एक रात नींद न आए तो अगले दिन सिर दर्द और थकान से बुरा हाल हो जाता है। लेकिन ना तो इस शख्स को कोई बीमारी है और ना ही किसी बात की टेंशन, फिर भी 50 साल से सोए नहीं हैं। तो चलिए जानते हैं क्या है पूरा मामला?
Mohan Lal Dwivedi Rewa दरसअल रीवा जिले में एक ऐसी शख्सियत हैं, जिन्होंने पिछले 5 दशकों से नींद का स्वाद नहीं चखा है। रीवा के रिटायर्ड ज्वाइंट कलेक्टर मोहन लाल द्विवेदी आज चिकित्सा जगत और आम लोगों के लिए एक जीता-जागता रहस्य बन चुके हैं। 75 वर्षीय मोहन लाल द्विवेदी बताते हैं कि उन्होंने आखिरी बार सुकून की नींद 1975 के इमरजेंसी के दौरान ली थी। उसके बाद से उनकी आंखों से नींद जैसे हमेशा के लिए विदा हो गई।
मोहल लाल कहते हैं, रात को बिस्तर पर लेटता जरूर हूं, पलकें भी बंद होती हैं, लेकिन दिमाग जागता रहता है। न झपकी आती है, न गहरी नींद। आमतौर पर नींद की कमी से मानसिक और शारीरिक बीमारियां घेर लेती हैं, लेकिन द्विवेदी जी के मामले में सब उल्टा है। घंटों लगातार काम करने के बाद भी मोहन लाल ना तो थकान महसूस करते हैं और ना ही कमजोरी। मोहन की मानें तो अपनी इस विचित्र स्थिति को ठीक करने के लिए उन्होंने दिल्ली और मुंबई के बड़े अस्पतालों के चक्कर काटे। लेकिन विज्ञान के पास इसका कोई जवाब नहीं मिला।
अपनी इस समस्या का उपचार खोजने के लिए मोहन ने योग, आयुर्वेद और झाड़-फूंक का भी सहारा लिया, लेकिन नींद आना तो दूर थकावट तक महसूस नहीं होती। वहीं, डॉक्टरों के लिए यह शोध का विषय है कि बिना स्लीप साइकिल के उनका शरीर और मस्तिष्क इतने सालों से पूरी तरह सामान्य कैसे काम कर रहा है। मोहन लाल द्विवेदी कहते हैं शुरुआत में अजीब लगता था, लेकिन अब यह मेरी जीवनशैली है। शरीर स्वस्थ है, यही ईश्वर की कृपा है।
मोहन की मानें तो काम करने की अद्भुत क्षमता बाणसागर बांध परियोजना के दौरान वे कई किलोमीटर पैदल चलते थे, जिसे देखकर उनके जूनियर भी पस्त हो जाते थे। दिनचर्या रात के सन्नाटे में जब दुनिया सोती है, वे किताबें पढ़कर या टहलकर अपना समय बिताते हैं।