जनजातीय समुदाय को भले ही कोई वनवासी कहे, लेकिन वे असल में आदिवासी हैं: राष्ट्रपति मुर्मू

जनजातीय समुदाय को भले ही कोई वनवासी कहे, लेकिन वे असल में आदिवासी हैं: राष्ट्रपति मुर्मू

जनजातीय समुदाय को भले ही कोई वनवासी कहे, लेकिन वे असल में आदिवासी हैं: राष्ट्रपति मुर्मू
Modified Date: June 18, 2026 / 04:33 pm IST
Published Date: June 18, 2026 4:33 pm IST

(तस्वीरों के साथ)

बैतूल, 18 जून (भाषा) राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने बृहस्पतिवार को कहा कि जनजातीय समुदाय को भले ही कोई वनवासी कहे, लेकिन वास्तव में वे आदिवासी हैं।

मुर्मू ने प्राकृतिक संपदाओं के प्रति संवेदनशील जीवनशैली विकसित किए जाने के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि आज तनाव और युद्ध से त्रस्त दुनिया में इसकी आवश्यकता अतीत के किसी भी कालखंड की तुलना में कहीं अधिक हो गई है।

राष्ट्रपति मध्यप्रदेश के आदिवासी बहुल बैतूल जिले में प्रजापिता ब्रह्मकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की ओर से आयोजित ‘आध्यात्मिक जागृति से जनजातीय समाज का सशक्तीकरण’ कार्यक्रम को संबोधित कर रही थीं।

उन्होंने कहा, “जनजातीय समुदाय की जीवनशैली सहज रूप से अध्यात्म की मूलभूत प्रेरणाओं के करीब होती है। हम जनजातीय समुदायों को आदिवासी कहते हैं। कुछ लोग उन्हें वनवासी कहते हैं। वे आदिवासी ही हैं।”

राष्ट्रपति की यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रही है, क्योंकि कांग्रेस आरोप लगाती आई है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) जनजातीय समाज को ‘वनवासी’ कहकर उनकी अस्मिता को मिटा रहे हैं।

मुर्मू ने कहा कि आदिम और आदिवासी तो सृष्टि के आरंभ से ही इस धरा पर रहते हैं और उनकी यह जीवनशैली आध्यात्मिकता के कारण है।

उन्होंने कहा कि प्राकृतिक संपदाओं से जुड़ाव आदिवासी समाज की वह सहज शक्ति है, जो सर्व-मंगलकारी सोच और कार्यनीति को जीवन के हर आयाम में सामने लाती है।

मुर्मू ने कहा, “वे सुख, शांति, आनंद और प्रेम में जीना जानते हैं। हिंसा से दूर रहते हैं। वे आदिम काल में जैसे थे, आज भी वैसे ही हैं। जैसे कि गीली मिट्टी… उसे जिस आकार में ढालो, ढल जाती है। वे प्रकृति की पूजा करते हैं। केवल प्रकृति ही नहीं, वे पंच तत्वों की भी पूजा करते हैं।”

उन्होंने कहा, “वे (आदिवासी) धरती, आकाश, वायु, जल, सूर्य और चंद्र की पूजा करते हैं। वे कोई मंदिर या पूजा स्थल नहीं बनाते हैं।”

इस मौके पर मुर्मू ने यह भी कहा कि उपभोग की संस्कृति पर आधारित आज की भागमभाग भरी दुनिया में समाज के हर वर्ग की आध्यात्मिक शुचिता बहुत महत्वपूर्ण हो गई है।

उन्होंने कहा कि इसी के बल पर दीर्घकालिक रूप से समता-परक आचरण-पद्धति और प्राकृतिक संपदाओं के प्रति संवेदनशील जीवनशैली विकसित की जा सकती है।

राष्ट्रपति ने कहा, “आज तनाव और युद्ध से त्रस्त विश्व में इसकी आवश्यकता अतीत के किसी भी कालखंड की तुलना में और अधिक हो गई है। ऐसे परिदृश्य में ‘अध्यात्मिक जागृति से आदिवासी समाज का सशक्तीकरण’ जैसे महासम्मेलनों का महत्व और भी बढ़ जाता है।”

उन्होंने कहा कि भारतीय जीवन दृष्टि के अनुसार कार्यरत प्रत्येक संस्था को इस बात का हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि समाज के किसी भी वर्ग का सशक्तीकरण केवल आर्थिक विकास तक सीमित नहीं हो सकता।

मुर्मू ने कहा, “वास्तविक सशक्तीकरण तब होता है, जब व्यक्ति आत्मविश्वास, आत्मसम्मान और जागरूकता के बल पर सामाजिक दायित्व बोध के साथ अपने कार्यक्षेत्र में सक्रिय होता है। आध्यात्मिक जागृति व्यक्ति को उसकी आंतरिक शक्तियों का अनुभव कराती है और साथ ही उसे सकारात्मक सोच एवं जीवन के उच्च उद्देश्यों से जोड़ती है।”

राष्ट्रपति ने विकास और पारंपरिक मूल्यों के संतुलन को एक सशक्त एवं समृद्ध समाज का आधार करार दिया। उन्होंने कहा कि सार्थक विकास वह है, जो हमारी जड़ों और जीवन मूल्यों से पोषण भी ग्रहण करे तथा उन जड़ों को मजबूत भी बनाए।

मुर्मू ने कहा, “हम जब ऐसी समग्र दृष्टि से काम करेंगे, तभी समाज में समसरता और समता की प्रबल धारा प्रवाहित होगी, तभी हम समावेशी विकास के नये प्रतिमान स्थापित कर सकेंगे।”

उन्होंने लोगों से आग्रह किया कि वे वर्ष 2047 तक एक ऐसे विकसित भारत के निर्माण के लिए अधिक प्रतिबद्धता के साथ काम करें, जहां अध्यात्म, सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण और मानव-कल्याण समावेशी विकास की आधारशिला बनें।

मुर्मू ने कहा कि आदिवासी समाज अगर धरती को क्षति भी पहुंचाता है तो वह पहले उसे नमन करता है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज आत्मसम्मान और धैर्य के साथ जीता है तथा कभी भी अपनी समस्याओं के बारे में नहीं बोलता है।

मुर्मू ने कहा, “आदिवासी समाज स्वाभिमान और धैर्य के साथ जीता है। वह अपनी समस्याओं के बारे में किसी को नहीं बताता। आदिवासी कभी कुछ नहीं मांगते और प्रकृति के साथ रहते है। वे इस उम्मीद के साथ जीते हैं कि उन्हें समय के साथ चीजें मिलेंगी। वे शांति से रहना पसंद करते हैं।”

इस मौके पर मध्यप्रदेश के राज्यपाल मंगू भाई पटेल और केंद्रीय जनजातीय कार्य राज्य मंत्री दुर्गा दास उइके भी मौजूद थे।

राष्ट्रपति 18 से 22 जून तक मध्यप्रदेश और ओडिशा के दौरे पर हैं। वह 19 जून को ओंकारेश्वर में अंतरराष्ट्रीय सिकल सेल दिवस कार्यक्रम में शामिल होंगी और फिर ओडिशा के रायरंगपुर में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) भुवनेश्वर की ओर से आयोजित चिकित्सा शिविर, कुसुमी ब्लॉक के अंतर्गत खनन प्रभावित गांवों के लिए वृहत एकीकृत ग्रामीण नल जल आपूर्ति योजना, ब्रह्माकुमारी संस्था के मातृशक्ति भवन और रायरंगपुर जिले के विशेष सर्किट हाउस और पुलिस जिला, रायरंगपुर का उद्घाटन करेंगी।

अगले दिन 20 जून को राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पहाड़पुर में विद्यालय और कौशल केंद्र सहित विभिन्न जगहों का दौरा करेंगे और लाभार्थियों एवं बच्चों से बातचीत करेंगे। इसके बाद, दोनों रायरंगपुर में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में शामिल होंगे।

मुर्मू 21 जून को मध्यप्रदेश लौटेंगी और जबलपुर में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस समारोह में हिस्सा लेंगी। उसी दिन वह जबलपुर के रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के 36वें दीक्षांत समारोह में शामिल होंगी।

अगले दिन 22 जून को राष्ट्रपति मध्यप्रदेश के कूनो राष्ट्रीय उद्यान में सहरिया जनजाति के सदस्यों, चीता ट्रैकर्स, पर्यटक गाइड और कूनो फील्ड टीम के सदस्यों के साथ संवाद करेंगी।

भाषा

ब्रजेन्द्र दिमो पारुल

पारुल


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