मुंबई, 20 अगस्त (भाषा) बंबई उच्च न्यायालय ने बांद्रा के एक फुटबॉल मैदान के आरक्षण में बदलाव कर उसे प्रदर्शनी केंद्र बनाने के प्रस्ताव को मंजूरी देने के बृहन्मुंबई महानगर पालिका (बीएमसी) के फैसले पर बृहस्पतिवार को नाखुशी जाहिर की।
अदालत ने खास तौर पर इस बात को लेकर नाखुशी जाहिर की कि यह कदम तब उठाया गया, जब नगर निकाय ने फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई होने तक यथास्थिति बनाए रखने का आश्वासन दिया था।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रवींद्र घुगे और न्यायमूर्ति गौतम अनखड़ की पीठ ने कहा कि जब अधिकारी अदालत को मौखिक आश्वासन देते हैं और फिर उसके उलट कोई फैसला लिया जाता है, तो “कानून की गरिमा” दांव पर लग जाती है।
पीठ ने बीएमसी को आदेश दिया कि वह बांद्रा रिक्लेमेशन स्थित नेविल डिसूजा फुटबॉल मैदान को खेल के मैदान से प्रदर्शनी केंद्र में तब्दील करने के अपनी आम सभा के फैसले पर आगे कोई कदम न उठाए।
मुंबई फुटबॉल संघ (एमएफए) ने आरक्षण में बदलाव के बीएमसी के प्रस्ताव को उच्च न्यायालय में चुनौती दी है।
एमएफए की याचिका पर 10 अगस्त को हुई सुनवाई के दौरान बीएमसी ने हलफनामा दाखिल करने के लिए समय मांगा था। उसने अदालत को मौखिक रूप से आश्वासन दिया था कि मामले में यथास्थिति बनाए रखी जाएगी और कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया जाएगा।
हालांकि, बीएमसी की आम सभा ने मंगलवार (18 अगस्त) को मैदान के आरक्षण में बदलाव के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी।
जब अदालत ने बृहस्पतिवार को नगर निकाय से सवाल किया कि मौखिक आश्वासन दिए जाने के बावजूद ऐसा फैसला कैसे लिया गया, तो बीएमसी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गिरीश गोड़बोले ने कहा कि आयुक्त और अन्य संबंधित अधिकारियों को अदालत में दिए गए आश्वासन की जानकारी नहीं थी।
पीठ ने इस पर नाखुशी जाहिर करते हुए कहा, “यहां कानून की गरिमा दांव पर है। अगर अधिकारी इस तरह का रवैया दिखाएंगे, तो यह अपने आप में एक समस्या है।”
उच्च न्यायालय ने बीएमसी के सवाल किया कि लोग अब फुटबॉल कहां खेलेंगे।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “कुछ जगहों को खुला छोड़ना होगा। वरना हमारी अगली पीढ़ी यह भूल जाएगी कि खुले मैदान में खेले जाने वाले खेल क्या होते हैं।”
पीठ ने बीएमसी को मामले में हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया और अगली सुनवाई सितंबर के लिए निर्धारित कर दी।
भाषा पारुल नरेश
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