मुंबई, 29 जुलाई (भाषा) बंबई उच्च न्यायालय ने ‘सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया’ (एसडीपीआई) के दो पदाधिकारियों के खिलाफ मुंबई पुलिस की ओर से जारी जिला बदर करने के आदेशों को रद्द कर दिया है। अदालत ने टिप्पणी की कि केवल यह कहना कि ‘बाबरी मस्जिद को नहीं गिराया जाना चाहिए था’, देश-विरोधी नहीं है।
न्यायमूर्ति माधव जामदार की एकल पीठ ने मंगलवार को अपने फैसले में कहा कि पुलिस की कार्रवाई चुनिंदा प्रतीत होती है और याचिकाकर्ताओं के धर्म से प्रभावित थी।
अदालत ने फिरोज अब्दुल वहाब खान और मोहम्मद रफीक गुलाम रसूल अंसारी के खिलाफ जारी जिला बदर करने के आदेशों को रद्द कर दिया।
दिसंबर 2025 में मुंबई पुलिस ने आदेश जारी कर इन दोनों को एक साल के लिए मुंबई से बाहर रहने को कहा था।
पुलिस की यह कार्रवाई तीन प्राथमिकी पर आधारित थी, जो वक्फ विधेयक, सीमेंट गोदामों से होने वाले वायु प्रदूषण और बाबरी मस्जिद के मुद्दे को लेकर हुए विरोध प्रदर्शनों में उनकी भागीदारी के संबंध में दर्ज की गई थीं।
बाबरी मस्जिद से जुड़े विरोध-प्रदर्शन पर निर्भरता को लेकर आपत्ति जताते हुए न्यायमूर्ति जामदार ने मौखिक रूप से टिप्पणी की कि मस्जिद के विध्वंस पर राय जाहिर करने को राष्ट्र-विरोधी नहीं माना जा सकता।
न्यायाधीश ने कहा, ”उनके अनुसार, बाबरी मस्जिद को गिराया नहीं जाना चाहिए था; यह उनकी धारणा है। यह राष्ट्र-विरोधी कैसे है? यह राष्ट्र-विरोधी नहीं हो सकता। हर किसी को अधिकार है।”
पीठ ने दोनों याचिकाकर्ताओं को निशाना बनाने के लिए पुलिस की आलोचना भी की और यह गौर किया कि अन्य राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता भी उन्हीं प्रदर्शनों में शामिल हुए थे।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि एफआईआर में केवल नारेबाजी का उल्लेख किया गया था और इससे किसी व्यक्ति या सार्वजनिक संपत्ति को कोई नुकसान पहुंचने का संकेत नहीं मिलता है। तथा साथ ही भी कहा कि काल्पनिक आशंकाओं के आधार पर मौलिक अधिकारों को सीमित नहीं किया जा सकता है।
राज्य का प्रतिनिधित्व कर रहे मुख्य अभियोजक शिशिर हिरे ने आरोप लगाया कि आरोपियों के प्रतिबंधित पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) के साथ संबंध थे और उनका आचरण सामाजिक सौहार्द बिगाड़ सकता था।
हालांकि, अदालत ने पीएफआई के साथ कथित संबंधों पर भरोसा करने से इनकार कर दिया और यह गौर किया कि यह दावा याचिकाकर्ताओं को जारी किए गए कारण बताओ नोटिस का हिस्सा नहीं था।
भाषा संतोष पवनेश
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