मुंबई, तीन अगस्त (भाषा) उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश अभय ओका ने कहा है कि नागरिकों को यह बताना या सिखाना अदालतों का काम नहीं है कि उन्हें क्या कहना चाहिए और क्या नहीं। उन्होंने संवैधानिक अदालतों से उन मामलों को खारिज करने का आग्रह किया, जो सिर्फ असहमति की आवाज को दबाने के लिए दर्ज किए गए हैं।
न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) ओका ने मुंबई में शनिवार को आयोजित पहली ‘अधिवक्ता हारून सोलकर स्मृति व्याख्यान शृंखला’ में कहा कि अदालतों को नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए प्रयास करना चाहिए, फिर चाहे न्यायाधीश याचिकाकर्ताओं की राय से सहमत हों या नहीं।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि हर किसी को शांतिपूर्ण तरीके से विरोध-प्रदर्शन करने का अधिकार है और संविधान भी इसे मान्यता देता है।
न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) ओका ने आयरलैंड के मशहूर लेखक सर थॉमस मूर का हवाला देते हुए कहा कि नागरिकों से यह उम्मीद नहीं की जाती कि वे केवल वही बातें कहें, जो उस समय के शासकों को पसंद हों।
उन्होंने कहा, “अगर लोकतंत्र को जीवित रखना है, तो हमें भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) और 21 (मौलिक अधिकारों से संबंधित) के तहत प्रदत्त स्वतंत्रता की रक्षा करनी होगी, भले ही इन मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए हमें भारी कीमत क्यों न चुकानी पड़े।”
न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) ओका ने कहा कि नागरिकों को अभिव्यक्ति की आजादी के अपने मौलिक अधिकार के उल्लंघन में दर्ज आपराधिक मामलों को रद्द कराने के लिए अदालतों का रुख करने को मजबूर होना पड़ता है।
उन्होंने कहा कि जब ऐसे मामले सुनवाई के लिए आते हैं, तो उन्हें खारिज करना अदालत की जिम्मेदारी है।
पूर्व न्यायाधीश ने कहा, “हो सकता है कि याचिकाकर्ताओं की कही या जाहिर की गई बातें अदालत को पसंद न आएं, लेकिन फिर भी बोलने और अपनी बात रखने की आजादी की रक्षा करना न्यायालय का फर्ज है। याचिकाकर्ता को यह बताना या सिखाना अदालत का काम नहीं है कि उन्हें क्या कहना चाहिए और क्या नहीं।”
उन्होंने कहा कि अदालत को बस यह देखना होता है कि कोई अपराध बनता है या नहीं और क्या बोलने और अपनी बात रखने की आजादी के मौलिक अधिकार का उल्लंघन हुआ है।
न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) ओका ने कहा कि हर नागरिक को अपनी मांग रखने का अधिकार है और राज्य का यह कर्तव्य है कि वह उन पर विचार करे।
उन्होंने कहा, “अगर मांगों पर विचार नहीं किया जाता है, तो नागरिकों को शांतिपूर्ण तरीके से विरोध-प्रदर्शन करने का अधिकार है, क्योंकि असंतोष व्यक्त करने का यही एकमात्र तरीका है।”
न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) ओका अगस्त 2021 से मई 2025 तक उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीश थे।
उन्होंने कहा कि यह अदालतों का कर्तव्य है कि वे हर नागरिक की अभिव्यक्ति की आजादी की रक्षा करें और उसे दबाने न दें, साथ ही संविधान और उसके मूल्यों को कमजोर करने की किसी भी कोशिश को नाकाम करने के लिए हमेशा सतर्क रहें।
न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) ओका ने कहा, “मेरा हमेशा से मानना रहा है कि नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए अदालतों को सबसे आगे रहना चाहिए। यह सुनिश्चित करना अदालतों का परम कर्तव्य है कि संविधान और उसके आदर्शों का उल्लंघन न हो।”
उन्होंने सवाल किया कि अगर अदालतें इन मौलिक अधिकारों की रक्षा नहीं करेंगी, तो कौन करेगा?
न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) ओका ने सरकार को उसके बुनियादी कर्तव्यों और दायित्वों की याद दिलाते हुए कहा कि जब राज्य किसी नागरिक के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है, तो वह असल में अपने कर्तव्य का ही उल्लंघन कर रहा होता है।
उन्होंने कहा कि संविधान में धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र और आजादी जैसे कुछ आदर्श हैं और इन आदर्शों तथा (संविधान में किए गए) प्रावधानों का सम्मान करना राज्य का कर्तव्य है।
न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) ओका ने कहा, “लेकिन आज के समय में हम शायद ही कभी सरकार को संविधान के आदर्शों का सम्मान करते हुए देखते हैं।”
उन्होंने आलोचना के प्रति बढ़ती असहिष्णुता पर चिंता जताई और कहा कि अगर कोई व्यक्ति किसी खास नजरिये को पसंद नहीं करता या उससे सहमत नहीं है, तो उस पर प्रतिक्रिया देने का सही तरीका यह है कि वह अपना दृष्टिकोण सामने रखे, न कि संबंधित व्यक्ति पर हमला करे।
न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) ओका ने कहा कि लोकतंत्र में हर नागरिक को अपनी मांगें रखने का अधिकार है और उन पर ध्यान देना सरकार का कर्तव्य है।
उन्होंने कहा, “सरकार मांगों को माने या न माने, लेकिन उन पर विचार करना, राय-मशविरा लेना और चर्चा करना सरकार का कर्तव्य है। लेकिन शायद समय बीतने के साथ हम सभी इन अहम सिद्धांतों को भूल गए हैं।”
भाषा पारुल अविनाश
अविनाश